30 कॉलेजों के छात्र-छात्राओं ने लिया हिस्सा, बंधु तिर्की बोले- भाषा की उपेक्षा झारखंड की सांस्कृतिक पहचान की उपेक्षा
रांची। झारखंड की जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और संवैधानिक अधिकारों की मांग को लेकर मंगलवार को राजधानी में विशाल भाषा मार्च निकाला गया। जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा बचाओ मोर्चा के आह्वान पर आयोजित इस मार्च में करीब 10 हजार छात्र-छात्राओं, शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों, भाषा प्रेमियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। राज्य के विभिन्न जिलों से करीब 30 कॉलेजों के विद्यार्थी पहुंचे। मार्च के जरिए मातृभाषा में शिक्षा, शिक्षकों की नियुक्ति और भाषाओं के विकास के लिए संस्थागत व्यवस्था की मांग उठाई गई।
मोरहाबादी स्थित बापू वाटिका से शुरू हुआ मार्च अल्बर्ट एक्का चौक होते हुए भगवान बिरसा मुंडा के समाधि स्थल पहुंचा। इस दौरान झारखंडी भाषाओं के सम्मान और अधिकारों के समर्थन में नारे लगाए गए। कार्यक्रम में पूर्व शिक्षा मंत्री बंधु तिर्की, खालिद अहमद, प्रो. हरि उरांव, वृंदावन सहित विभिन्न भाषाओं के सेवानिवृत्त प्रोफेसर, शिक्षाविद और बुद्धिजीवी शामिल हुए। मोर्चा के नौ भाषा संयोजकों और विभिन्न भाषा प्रतिनिधियों ने भी सक्रिय भागीदारी निभाई।
भाषा की उपेक्षा झारखंड की सांस्कृतिक पहचान की उपेक्षा : बंधु तिर्की
पूर्व शिक्षा मंत्री बंधु तिर्की ने कहा कि झारखंड की पहचान केवल भौगोलिक सीमाओं, खनिज संपदा और प्राकृतिक संसाधनों से नहीं, बल्कि यहां की समृद्ध जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं, संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक विरासत से है। भाषा किसी समाज की आत्मा होती है। इसके माध्यम से एक पीढ़ी अपने पूर्वजों का ज्ञान, इतिहास, संस्कृति और जीवन दर्शन अगली पीढ़ी तक पहुंचाती है। इसलिए झारखंडी भाषाओं की उपेक्षा राज्य की सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक विरासत की उपेक्षा है।
उन्होंने कहा कि संथाली, मुंडारी, हो, कुड़ुख, खड़िया, नागपुरी, खोरठा, कुरमाली और पंचपरगनिया सहित कई भाषाओं में लोकगीत, लोककथाएं, कहावतें, पारंपरिक ज्ञान और साहित्य का विशाल भंडार है। इसके बावजूद इनके विकास और शैक्षणिक विस्तार के लिए अपेक्षित संस्थागत व्यवस्था नहीं बन पाई है।
संगोष्ठी और नारों से नहीं, नीति और बजट से बचेगी भाषा
बंधु तिर्की ने कहा कि भाषा संरक्षण केवल संगोष्ठियों, सम्मेलनों और नारों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसके लिए ठोस नीतिगत निर्णय, पर्याप्त बजट, शिक्षकों की नियुक्ति, पाठ्यक्रम निर्माण, शोध संस्थानों की स्थापना और प्रशासनिक स्तर पर प्रभावी पहल जरूरी है। जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं को प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा और विश्वविद्यालय स्तर तक उचित स्थान मिलना चाहिए।
मोर्चा की 10 प्रमुख मांगें
- सभी जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण और विकास के लिए प्रभावी भाषा नीति लागू की जाए।
- राज्य में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा अकादमी की स्थापना हो।
- प्राथमिक से विश्वविद्यालय स्तर तक मातृभाषा में पढ़ाई की व्यवस्था की जाए।
- स्वीकृत एवं आवश्यक शिक्षकों के रिक्त पदों पर शीघ्र नियुक्ति हो।
- प्रत्येक भाषा के विकास के लिए अलग बजट निर्धारित किया जाए।
- साहित्यकारों, लेखकों, कवियों, लोक कलाकारों और शोधकर्ताओं को प्रोत्साहन एवं सम्मान मिले।
- विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में भाषाओं की पढ़ाई और शोध की बेहतर व्यवस्था हो।
- लोक साहित्य, लोकगीत, लोककथाओं, पारंपरिक ज्ञान और मौखिक इतिहास का दस्तावेजीकरण किया जाए।
- सरकारी योजनाओं, प्रशासनिक गतिविधियों और जनसंपर्क माध्यमों में झारखंडी भाषाओं को उचित स्थान मिले।
- भाषा संरक्षण एवं संवर्धन के लिए विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और भाषा प्रतिनिधियों की भागीदारी से स्थायी व्यवस्था विकसित की जाए।
भाषा किसी एक समुदाय की नहीं, पूरे समाज की साझा विरासत
मोर्चा के प्रतिनिधियों ने कहा कि झारखंड आंदोलन के मूल आधारों में भाषा, संस्कृति, जल, जंगल, जमीन और आदिवासी-मूलवासी अस्मिता प्रमुख रहे हैं। राज्य गठन के इतने वर्षों बाद भी स्थानीय भाषाओं को शिक्षा, रोजगार, प्रशासन और संस्थागत विकास में अपेक्षित स्थान नहीं मिलना गंभीर चिंता का विषय है।
वक्ताओं ने कहा कि भाषा किसी एक जाति, धर्म या समुदाय की संपत्ति नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझा विरासत है। झारखंड की जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाएं विभिन्न समुदायों को एक-दूसरे से जोड़ती हैं। इनका संरक्षण किसी एक समुदाय का आंदोलन नहीं, बल्कि राज्य की पहचान, गौरव और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को बचाने का सामूहिक प्रयास है।
मातृभाषा घर और गांव तक सीमित नहीं रहे
मार्च में शामिल छात्र-छात्राओं ने कहा कि उनकी मातृभाषा केवल घर और गांव तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों और सरकारी संस्थानों में भी इसे सम्मानजनक स्थान मिलना चाहिए। विद्यार्थियों की बड़ी भागीदारी ने संकेत दिया कि नई पीढ़ी अपनी भाषा और सांस्कृतिक पहचान को लेकर जागरूक है और इसके अधिकारों के लिए आवाज उठाने को तैयार है।
भगवान बिरसा मुंडा के समाधि स्थल पर पहुंचकर मार्च में शामिल लोगों ने झारखंड की भाषाई एवं सांस्कृतिक विरासत की रक्षा का संकल्प लिया। वक्ताओं ने कहा कि बिरसा मुंडा का संघर्ष अपनी अस्मिता, परंपरा, संस्कृति और स्वाभिमान की रक्षा का भी संघर्ष था। झारखंडी भाषाओं के सम्मान और संरक्षण की लड़ाई उसी ऐतिहासिक चेतना को आगे बढ़ाने का प्रयास है।
अधिकार मिलने तक जारी रहेगा आंदोलन
मोर्चा ने स्पष्ट किया कि भाषा मार्च किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति के विरोध में नहीं, बल्कि झारखंड की भाषाओं के अधिकार, सम्मान और भविष्य को सुरक्षित करने के उद्देश्य से आयोजित किया गया। यह आंदोलन एक दिन के कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहेगा। जब तक सभी जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं को शैक्षणिक, सामाजिक और संस्थागत अधिकार नहीं मिलते, तब तक लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से संघर्ष जारी रहेगा।
भाषा मार्च ने सरकार और समाज को संदेश दिया कि झारखंडी भाषाएं केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि राज्य की पहचान, इतिहास, संस्कृति और अस्मिता की आधारशिला हैं। भाषा बचेगी, तभी संस्कृति बचेगी और संस्कृति बचेगी, तभी झारखंड की विशिष्ट पहचान सुरक्षित रहेगी।





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