दलमा वन्यजीव अभयारण्य के घने जंगलों में पाई जाने वाली दुर्लभ जड़ी-बूटियां अब रक्तस्राव रोकने में कारगर साबित हो सकती हैं। हाल ही में दवा उद्योग से जुड़ी कई प्रतिष्ठित कंपनियों द्वारा किए गए सर्वे में ऐसे पौधों की पहचान की गई है, जिनसे रक्तस्राव रोकने और घाव भरने की दवाएं तैयार की जाएंगी। इनमें प्रमुख रूप से गुवाना लेप्टो स्टैचया (खेरा परोल) और वुडफोर्डिया फुटिकोसा जैसे दुर्लभ पौधे शामिल हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, इन पौधों में टेनिन नामक तत्व की मात्रा अत्यधिक पाई जाती है, जो रक्तस्राव रोकने और त्वचा पुनर्निर्माण में बेहद प्रभावी होता है।
दलमा अभयारण्य के आसपास करीब 85 गांव बसे हुए हैं, जहां के लोग अब भी वन आधारित जीवनशैली और पारंपरिक उपचार विधियों पर निर्भर हैं। स्थानीय आदिवासी समुदाय लंबे समय से इन पौधों का उपयोग रक्तस्राव, घाव भरने और अन्य बीमारियों के इलाज में करते आ रहे हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, इन पौधों के गुणों का पता संयोग से चला। एक बार ग्रामीणों ने खरगोश का शिकार किया और उसके मांस के टुकड़े इस पौधे के पत्तों में लपेट दिए। कुछ घंटों बाद देखा गया कि मांस के टुकड़े आपस में जुड़ गए थे। इसके बाद लोगों ने इस पौधे को “खेरा परोल” कहना शुरू किया ‘खेरा’ का अर्थ है खरगोश और परोल का अर्थ पत्ता।
यह घटना वैज्ञानिकों के लिए भी शोध का विषय बन गई। जब इस पौधे का रासायनिक विश्लेषण किया गया, तो पता चला कि इसमें टेनिन की मात्रा सामान्य औषधीय पौधों से कई गुना अधिक है। वनस्पति विशेषज्ञ और फॉरेस्टर राजा घोष के अनुसार, ग्रामीणों से मिली जानकारी के आधार पर वन विभाग इन पौधों की वैज्ञानिक पहचान और संरक्षण में जुट गया है। इसके लिए देशभर के शोधकर्ताओं को आमंत्रित किया गया है और दवा कंपनियों ने भी वन विभाग से संपर्क साधा है। जानकारी के मुताबिक, केरल, गुवाहाटी और पुणे की कई फार्मास्युटिकल कंपनियां दलमा क्षेत्र के कर्मचारियों और ग्रामीणों से संपर्क में हैं। यहां औषधीय पौधों पर कार्यशालाएं और अनुसंधान केंद्र स्थापित करने की भी योजना बनाई जा रही है।
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