पाकुड़ से जितेन्द्र यादव की रिपोर्ट
पाकुड़: आदिवासी समाज की समृद्ध परंपरा और प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक सोहराय पर्व का समापन रविवार को पूरे हर्षोल्लास और उल्लास के साथ हुआ। लगातार तीन दिनों तक चलने वाले इस महापर्व के अंतिम दिन शहर की सड़कों पर आदिवासी संस्कृति की अनुपम छटा देखने को मिली।
छात्रावास के आदिवासी छात्र-छात्राएं ढोल, नगाड़ा और मांदर की गूंज पर थिरकते हुए पारंपरिक वेशभूषा में जुलूस के रूप में सड़कों पर निकले।
रंग-बिरंगे परिधानों में सजी छात्राएं पारंपरिक नृत्य करती हुई झूमती नजर आईं, वहीं ढोल की थाप पर कदमताल करते युवाओं ने पूरे शहर को उत्सव के रंग में रंग दिया। हर दिशा में उमंग, मुस्कान और सांस्कृतिक गर्व की झलक साफ दिखाई दे रही थी।
कार्यक्रम के दौरान आदिवासी छात्र-छात्राओं में जबरदस्त उत्साह देखने को मिला।
सोहराय पर्व के महत्व पर प्रकाश डालते हुए छात्र नेता कमल मुर्मू ने कहा कि सोहराय केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की संस्कृति, परंपरा और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का उत्सव है।
यह त्योहार नई फसल, पशुधन और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है।
उन्होंने आगे कहा कि ऐसे आयोजनों से आदिवासी समाज की पहचान और भी सशक्त होती है तथा युवा पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़कर अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझती है।
“सोहराय हमारी जीवनशैली, सामूहिक एकता और प्रकृति से सह-अस्तित्व का प्रतीक है, जिसे आने वाली पीढ़ियों तक सहेज कर रखना हम सबकी जिम्मेदारी है,”
यह संदेश उन्होंने पूरे गर्व के साथ दिया।
सोहराय पर्व के इस भव्य आयोजन ने न केवल आदिवासी समाज की सांस्कृतिक समृद्धि को उजागर किया, बल्कि आपसी भाईचारे और एकता का भी सुंदर संदेश दिया।
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