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पार्टी ने सीएम नाम पर टिप्पणी से किया इनकार

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Khabar365news

पटना: दो दशक तक बिहार का राजकाज संभालने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल करने के बाद भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में सीएम के कैंडिडेट की तलाश तेज होनी तय है। नीतीश के इस्तीफे के बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी भाजपा के खाते में जानी तय है। नए सीएम के नाम पर अटकलबाजी कल ही शुरू हो गई थी, जब यह खबर आई कि जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के अध्यक्ष नीतीश को दिल्ली जाने के लिए मनाया जा रहा है।

बिहार में भाजपा के पास बड़े नेताओं की कोई कमी नहीं है, लेकिन दिल्ली में रेखा गुप्ता, ओडिशा में मोहन चरण मांझी, छत्तीसगढ़ में विष्णुदेव साय और मध्य प्रदेश में मोहन यादव को कुर्सी मिलने के उदाहरणों से सारे नेता सतर्क हैं। पार्टी नेतृत्व किसके नाम की पर्ची निकाल दे, ये अंदाजा किसी को नहीं है। भाजपा का संसदीय बोर्ड ऐसे मसलों पर फैसला लेता रहा है, लेकिन वहां क्या तय होगा, यह भनक फैसले से पहले शायद ही किसी को लग पाएगी।

नीतीश के सीएम पद छोड़कर राज्यसभा जाने के बाद यह जरूर संभव है कि भाजपा किसी पिछड़ा (OBC) या अति पिछड़ा (EBC) को ही मुख्यमंत्री के पद पर बिठाए। एनडीए की अगली सरकार में जेडीयू से दो डिप्टी सीएम की बात है। कहा जा रहा है कि एक तो नीतीश के बेटे निशांत कुमार होंगे। निशांत आज ही जदयू में विधिवत शामिल हो रहे हैं। निशांत को राजनीति में लाने के लिए नीतीश पर जेडीयू के ही नेता काफी समय से दबाव डाल रहे थे।

अब जब बिहार को अगला और नया मुख्यमंत्री देने की बारी भाजपा के पास आ गई है तो नेताओं का नाम उछलना स्वाभाविक है। बात लंबे समय से भाजपा के अघोषित सीएम कैंडिडेट रहे केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय की हो या इस समय सबसे मजबूत नेता बनकर उभरे डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी की या फिर विवाद-बयान से दूर पार्टी और संगठन का काम करने वाले दीघा के विधायक संजीव चौरसिया की। डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा और प्रदेश के पूर्व अध्यक्ष दिलीप जायसवाल भी विकल्प हैं, जो अमित शाह के करीबी नेता के तौर पर गिने जाते हैं। भाजपा के पास विधानसभा में 89 और परिषद में 22 सदस्य हैं। कई राज्यों में चौंका चुकी भाजपा इनमें से किसी को भी सीएम बना सकती है। पार्टी चाहे तो विधानमंडल से बाहर के किसी नेता को भी सीएम बना सकती है।

भाजपा की जीत दर जीत से यह साफ हो चुका है कि वह चुनाव से छह महीने पहले चुनाव की तैयारी करने वाली पार्टी नहीं है। पश्चिम बंगाल के चुनाव की तैयारी वह पिछले एक साल से कर रही है। अब फोकस बढ़ गया है। बिहार की राजनीति में प्रभाव बढ़ाने की रणनीति के साथ वो एक ऐसा मुख्यमंत्री चुन सकती है, जो पार्टी और सहयोगियों दलों के नेताओं से बेहतर तालमेल रख सके। जातीय गणित भाजपा देखती है, लेकिन वो इकलौती चीज नहीं है, जिस पर वो किसी को सीएम बनाती है। गिरिराज सिंह ने कहा है कि जो भी बनेगा, वो नीतीश कुमार की मर्जी से बनेगा। मतलब निकालें तो भाजपा के जिन नेताओं के नीतीश से रिश्ते बेहतर नहीं हैं, उनका चांस कमजोर होगा।

गठबंधन सरकार को चलाने के लिए राजनीतिक समझदारी के साथ जोड़-तोड़ का अनुभव जरूरी है। बिहार में इस तरह का अनुभव रखने वाले भी कई नेता भाजपा में हैं जो चुनाव के समय गठबंधन के दलों से सीट बंटवारे पर सहमति बनाते नजर आते हैं। लेकिन किस राजनेता के नाम पर अंतिम सहमति बनेगी, यह दिल्ली में ही तय होगा। उसके बाद ही पटना में पहले भाजपा और फिर एनडीए विधायक दल की बैठकों में जय-जय होगा। नाम का ऐलान विधायक दल की बैठक से पहले या बाद में होना औपचारिकता रहेगी।

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