रांची। झारखंड आंदोलन के पुरोधा और करोड़ों लोगों के प्रिय ‘दिशोम गुरु’ शिबू सोरेन की पहली पुण्यतिथि पर पूरा झारखंड उन्हें श्रद्धापूर्वक याद कर रहा है। आदिवासियों, मूलवासियों और वंचित समुदायों के अधिकारों की लड़ाई से लेकर अलग झारखंड राज्य के गठन तक, शिबू सोरेन का नाम राज्य के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है।
शिबू सोरेन का जन्म रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में हुआ था। उनके पिता सोबरन सोरेन सामाजिक न्याय और शोषण के खिलाफ संघर्ष करने वाले व्यक्तित्व थे। पिता की हत्या के बाद शिबू सोरेन ने कम उम्र में ही अन्याय के खिलाफ लड़ाई का रास्ता चुना और जनआंदोलनों के माध्यम से अपनी पहचान बनाई।
1970 के दशक में उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के गठन और विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने आदिवासी समाज, किसानों और मजदूरों के अधिकारों की आवाज बुलंद की। अलग झारखंड राज्य की मांग को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने में उनका योगदान निर्णायक माना जाता है।
15 नवंबर 2000 को झारखंड राज्य के गठन का सपना साकार हुआ। इसके बाद भी शिबू सोरेन राज्य की राजनीति के केंद्र में बने रहे। वे कई बार सांसद चुने गए और केंद्र सरकार में केंद्रीय मंत्री भी रहे। झारखंड के मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी भी उन्होंने संभाली।
उनकी राजनीति का मूल आधार जल, जंगल और जमीन के अधिकारों की रक्षा रहा। ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लोग उन्हें सम्मानपूर्वक ‘दिशोम गुरु’ कहकर पुकारते थे।
आज उनकी पहली पुण्यतिथि पर नेमरा सहित पूरे राज्य में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। लोग उनके संघर्ष, नेतृत्व और झारखंड के लिए किए गए योगदान को याद कर रहे हैं। शिबू सोरेन की राजनीतिक विरासत आज भी झारखंड की राजनीति और सामाजिक आंदोलनों को दिशा देने का काम कर रही है।
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