पाकुड़ ब्यूरो जितेन्द्र यादव की रिपोर्ट
पाकुड़।
लॉटरी की पर्ची भले ही छोटी हो, लेकिन पाकुड़ में इसके पीछे चल रहे कथित लेन-देन का हिसाब इतना बड़ा बताया जा रहा है कि कैलकुलेटर भी शायद कह दे—“भाई, मुझे चार्ज पर लगा दो!”

जिले में लंबे समय से कथित रूप से चल रहे अवैध लॉटरी के कारोबार को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं सामने आ रही हैं। कहीं 8 लाख रुपये की कथित मंथली, कहीं 2 लाख, कहीं 1 लाख 70 हजार तो कहीं 1 लाख रुपये तक की रकम दिए जाने की चर्चा है। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन अगर यह सिर्फ अफवाह है तो फिर सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिले के अलग-अलग इलाकों में अवैध लॉटरी का कारोबार कथित तौर पर खुलेआम कैसे संचालित हो रहा है?
पर्ची बेचने वालों से लेकर कथित बड़े नेटवर्क तक सवाल
स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि अवैध लॉटरी का नेटवर्क केवल पर्ची बेचने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे कथित तौर पर सप्लायर, होलसेलर और अलग-अलग इलाकों में पर्ची पहुंचाने वालों का नेटवर्क सक्रिय है।
सूत्रों के हवाले से शमीम शेख का नाम इस कथित नेटवर्क से जोड़ा जा रहा है। यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि लॉटरी की छपाई से लेकर सप्लाई तक का काम एक संगठित तरीके से किया जाता है। इन आरोपों की स्वतंत्र अथवा आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और पुलिस जांच के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
इसी तरह एक लाख अंसारी को कथित रूप से बड़ा होलसेलर/सप्लायर बताया जा रहा है। उनके खिलाफ पूर्व में मामले दर्ज होने की बात भी कही जा रही है, जिसकी आधिकारिक पुष्टि पुलिस रिकॉर्ड से किया जाना आवश्यक है।
नामों की लंबी फेहरिस्त, लेकिन कार्रवाई का इंतजार
स्थानीय चर्चाओं में बसीर शेख, रिबोन, फिटू और दुलाल समेत कई अन्य लोगों के नाम भी कथित नेटवर्क से जोड़े जा रहे हैं। सवाल यह है कि यदि इन नामों के पीछे वास्तव में कोई संगठित अवैध कारोबार है तो इसकी जड़ तक पहुंचने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
क्या केवल छोटे पर्ची विक्रेताओं पर कार्रवाई करके अवैध लॉटरी का खेल बंद हो सकता है?
या फिर पुलिस को कथित नेटवर्क के उन लोगों तक पहुंचना होगा, जहां से पर्ची की सप्लाई, पैसा और पूरा सिस्टम संचालित होने का आरोप है?
रोजाना 50 लाख से ज्यादा का कारोबार? आंकड़ा जांच का विषय
स्थानीय स्तर पर यह दावा भी किया जा रहा है कि पाकुड़ जिले में प्रतिदिन 50 लाख रुपये से अधिक का अवैध लॉटरी कारोबार होता है। यदि यह दावा सही है तो यह केवल जुआ खेलने वाले कुछ लोगों का मामला नहीं, बल्कि एक बड़े आर्थिक नेटवर्क की ओर इशारा करता है।
लेकिन सवाल यह भी है कि इतने बड़े कारोबार का पैसा आखिर जाता कहां है?
कौन पर्ची छापता है?
कौन सप्लाई करता है?
कौन वसूली करता है?
कौन हिसाब रखता है?
और सबसे अहम—किसके संरक्षण में यह पूरा खेल चल रहा है?
इन सवालों का जवाब केवल निष्पक्ष और विस्तृत पुलिस जांच से ही सामने आ सकता है।
दिहाड़ी मजदूरों की मेहनत पर लॉटरी का लालच भारी
इस कथित अवैध कारोबार का सबसे बड़ा असर उन गरीब और दिहाड़ी मजदूर परिवारों पर पड़ने की बात कही जा रही है, जो दिनभर मेहनत कर कुछ सौ रुपये कमाते हैं और रातोंरात लखपति बनने के लालच में अपनी मेहनत की कमाई लॉटरी में गंवा देते हैं।
कुछ रुपये की पर्ची से लाखों जीतने का सपना दिखाकर मेहनतकश लोगों की जेब खाली करना आखिर कब तक चलेगा?
एक परिवार की दिनभर की कमाई अगर कुछ मिनटों के लालच में चली जाए, तो नुकसान सिर्फ पैसे का नहीं होता—उसका असर पूरे परिवार की रसोई और भविष्य पर पड़ता है।
पुलिस के सामने अब सबसे बड़ा सवाल
पाकुड़ में यदि अवैध लॉटरी का कारोबार वास्तव में इतने बड़े पैमाने पर संचालित हो रहा है, तो पुलिस के सामने चुनौती केवल कुछ पर्चियां या छोटे विक्रेताओं को पकड़ने की नहीं है।
जरूरत है पूरे नेटवर्क की पहचान करने, वित्तीय लेन-देन की जांच करने, प्रिंटिंग और सप्लाई चैन का पता लगाने तथा मुख्य संचालकों तक पहुंचने की।
स्थानीय लोगों की निगाहें अब पाकुड़ पुलिस पर टिकी हैं।
क्या पुलिस इन आरोपों की जांच कर कथित अवैध लॉटरी नेटवर्क की जड़ तक पहुंचेगी?
क्या कथित मंथली के खेल की सच्चाई सामने आएगी?
क्या रोजाना लाखों के कारोबार के दावों की जांच होगी?
और अगर आरोप गलत हैं, तो क्या पुलिस जांच के जरिए इस पूरे भ्रम को भी साफ करेगी?
फिलहाल सवाल बहुत हैं और जवाब का इंतजार है।
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