राँची/हजारीबाग: झारखंड शिक्षा न्यायाधिकरण, राँची ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में हजारीबाग स्थित सेंट जेवियर्स स्कूल द्वारा कक्षा-4 के एक छात्र पर लगाए गए ‘अनुचित साधन’ (Unfair Means) के आरोप में दी गई दंडात्मक कार्रवाई को निरस्त कर दिया है। यह मामला न केवल एक छात्र के शैक्षणिक भविष्य से जुड़ा था, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में अनुशासन और बाल-अधिकारों के संतुलन पर भी गंभीर प्रश्न उठाता है।
प्रकरण के अनुसार, लगभग 10 वर्षीय छात्र आहान पर परीक्षा के दौरान नकल करने का आरोप लगाया गया था। स्कूल प्रशासन ने 28 फरवरी 2025 को जारी आदेश में, प्राचार्य फादर रोसनर के माध्यम से, छात्र को या तो उसी कक्षा में पुनः अध्ययन करने या विद्यालय त्याग प्रमाण पत्र (टीसी) लेने का विकल्प दिया था। इस निर्णय के समर्थन में CBSE के नियम 36.1 (IV) का हवाला दिया गया था।
छात्र के अभिभावक ने इस आदेश को न्यायाधिकरण में चुनौती दी। याचिकाकर्ता पक्ष के अधिवक्ताओं ने तर्क प्रस्तुत किया कि संबंधित परीक्षा CBSE द्वारा आयोजित न होकर विद्यालय की आंतरिक परीक्षा थी, अतः CBSE के नियम लागू नहीं होते। साथ ही, उन्होंने शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 का उल्लेख करते हुए कहा कि प्राथमिक शिक्षा पूर्ण होने से पूर्व किसी भी छात्र को न तो रोका जा सकता है और न ही विद्यालय से निष्कासित किया जा सकता है।
सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि छात्र का शैक्षणिक रिकॉर्ड उत्कृष्ट रहा है तथा उसे विभिन्न प्रतियोगिताओं में सम्मानित किया जा चुका है। इससे यह प्रश्न भी उठा कि एक मेधावी छात्र के विरुद्ध इस प्रकार की कठोर कार्रवाई कितनी उचित है। वहीं, विद्यालय प्रबंधन ने अनुशासन बनाए रखने को प्राथमिकता बताते हुए अपनी कार्रवाई को उचित ठहराया और इसे नजीर के रूप में प्रस्तुत किया।
सभी पक्षों की दलीलों पर विचार करने के उपरांत न्यायाधिकरण के अध्यक्ष सुधीर प्रसाद ने स्पष्ट किया कि विद्यालय द्वारा पारित आदेश विधिसम्मत नहीं है। उन्होंने उक्त आदेश को निरस्त करते हुए छात्र को तत्काल राहत प्रदान की।
यह निर्णय शिक्षा संस्थानों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश के रूप में सामने आया है कि अनुशासन की आवश्यकता की आड़ में विद्यार्थियों के वैधानिक अधिकारों एवं भावात्मक स्वास्थ्य की अनदेखी नहीं की जा सकती है।
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