साहिबगंज जिले से एक मामला सामने आया है, जिसमें सदर अस्पताल के हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉक्टर सचिन पर इलाज में लापरवाही और निजी क्लीनिक ले जाने का आरोप लगाया गया था। हालांकि बाद में मरीज के परिजन ने अपने ही आरोपों से पलटते हुए डॉक्टर को निर्दोष बताया मामला साहिबगंज के मदनसाही निवासी महुरूदीन अंसारी और उनके बेटे मुनतेसी आलम से जुड़ा है। एक वायरल वीडियो में महुरूदीन ने आरोप लगाया कि जब वे अपने बेटे को लेकर सदर अस्पताल पहुंचे तो डॉक्टर सचिन ने समय पर इलाज नहीं किया और कथित रूप से निजी क्लीनिक में आने का सुझाव दिया। परिजनों ने यह भी आरोप लगाया कि डॉक्टर ने मरीज की चिट्ठी फेंक दी और उचित व्यवहार नहीं किया।
हालांकि, दूसरे ही वीडियो में महुरूदीन अंसारी ने अपने पहले के बयान से पलटते हुए कहा कि डॉक्टर सचिन ने इमरजेंसी ड्यूटी से फुर्सत मिलते ही उनके बेटे का अच्छे से इलाज किया। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि डॉक्टर ने किसी प्रकार की पैसे की मांग नहीं की और न ही उन्हें निजी क्लीनिक बुलाया गया। परिजनों का कहना है कि डॉक्टर उस समय इमरजेंसी में अकेले थे, इसलिए तत्काल इलाज संभव नहीं हो सका।
इस पूरे घटनाक्रम में सवाल उठ रहा है कि जब डॉक्टर अपनी ड्यूटी पर थे और बाद में उन्होंने मरीज का समुचित इलाज किया, तो अस्पताल और डॉक्टर की छवि को धूमिल करने की कोशिश क्यों की गई? इसके साथ ही यह भी चर्चा का विषय बना कि महुरूदीन अंसारी अस्पताल परिसर में पान-गुटखा खाकर पहुंचे और अस्पताल जैसे संवेदनशील स्थान पर अनुशासनहीनता दिखाई। उनके द्वारा मीडिया में दिए गए उलझे और विरोधाभासी बयानों से पूरे मामले की गंभीरता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
इस संबंध में डॉक्टर सचिन ने बयान देते हुए कहा, “मैं इमरजेंसी ड्यूटी में था। हमारी प्राथमिकता होती है कि सबसे पहले इमरजेंसी रोगियों का इलाज किया जाए। जैसे ही फुर्सत मिली, हमने मरीज का पूरा इलाज किया। डॉक्टर का पहला फर्ज़ होता है कि वह सही समय पर सही इलाज करे।” अब सवाल यह है कि ऐसी स्थिति में झूठे आरोप लगाकर सरकारी अस्पताल और डॉक्टरों की छवि को बदनाम करना कहां तक उचित है? अस्पताल प्रशासन से भी अपेक्षा है कि वे मामले की पूरी जांच करें ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं से निपटा जा सके और स्वास्थ्य व्यवस्था पर जनता का भरोसा कायम रह सके।
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