संजय सेठ
केंद्रीय रक्षा राज्य मंत्री सह सांसद, रांची लोकसभा
झारखंड की धरती अपनी प्राकृतिक संपदा, सांस्कृतिक विविधता और आदिवासी जीवन-परंपराओं के लिए जानी जाती है। यहां के पर्व-त्योहार केवल उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ गहरे संबंध और सहअस्तित्व के प्रतीक हैं। इन्हीं में सबसे महत्वपूर्ण और जीवंत पर्व है — सरहुल। यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि प्रकृति, समाज और जीवन के संतुलन का संदेश देने वाला महान उत्सव है।
चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया से प्रारंभ होने वाला सरहुल बसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक है। जब पेड़-पौधे नए फूलों और पत्तियों से लद जाते हैं, तब यह पर्व मनाया जाता है। यह समय प्रकृति के नवजीवन का होता है, और इसी नवजीवन के स्वागत में आदिवासी और मूलवासी समुदाय उत्साहपूर्वक सरहुल मनाते हैं। इस पर्व के बाद ही नए फल-फूलों का सेवन प्रारंभ किया जाता है, जो प्रकृति के प्रति सम्मान और अनुशासन का प्रतीक है।
सरहुल का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र है — साल (सरई/सखुआ) वृक्ष। यह वृक्ष आदिवासी जीवन का आधार है। इसकी पत्तियां, लकड़ी, फूल, छाल – सबका उपयोग जीवन के हर पहलू में होता है। सरहुल में सरई फूलों का प्रयोग केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि यह प्रकृति के पुनर्जन्म और जीवन की निरंतरता का उत्सव है। वास्तव में, सरहुल प्रकृति की “क्रांति” का उत्सव है – जहां सूखी डालियों पर फिर से जीवन खिल उठता है।
इस पर्व की धार्मिक विधियां भी अत्यंत रोचक और अर्थपूर्ण हैं। गांव के पाहान द्वारा उपवास, सरना स्थल की पूजा, विभिन्न देवताओं के लिए अलग-अलग रंग के मुर्गों की बलि, और घड़े के जल से वर्षा का पूर्वानुमान। ये सभी परंपराएं प्रकृति और आध्यात्मिकता के गहरे संबंध को दर्शाती हैं। विशेष रूप से “धरती और आकाश के विवाह” की कल्पना इस पर्व को एक दार्शनिक ऊंचाई प्रदान करती है।
सरहुल के साथ जुड़े मछली और केकड़ा के अनुष्ठान भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इन्हें उर्वरता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। धान की खेती में इनके चूर्ण का प्रयोग यह दर्शाता है कि आदिवासी जीवन में हर परंपरा का सीधा संबंध कृषि और जीवन-निर्वाह से जुड़ा है।
इस पर्व का सामाजिक पक्ष भी उतना ही सशक्त है। ढोल, नगाड़ा और मंदार की थाप पर होने वाला सामूहिक नृत्य, “जे नाची से बांची” जैसे डॉ. रामदयाल मुंडा के कथन को साकार करता है। लाल और सफेद वस्त्र केवल पहनावा नहीं, बल्कि संघर्ष और पवित्रता का प्रतीक हैं। यह उत्सव समाज को जोड़ता है, समानता और एकता का संदेश देता है।
सरहुल को विभिन्न भाषाओं में अलग-अलग नामों से जाना जाता है:- मुंडारी, संथाली और हो भाषा में – बा या बाहा पोरोब, कुंड़ूख़ भाषा में – खद्दी या खे़खे़ल बेंजा , खड़िया भाषा में – जोनकोर, पंचपरगनिया, कुड़माली, खोरठा और नागपुरी भाषा में – सरहुल कहते हैं। लेकिन इसकी आत्मा हर जगह एक ही है: प्रकृति के प्रति श्रद्धा।
आज जब दुनिया पर्यावरण संकट से जूझ रही है, सरहुल जैसे पर्व हमें यह सिखाते हैं कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाए बिना मानव जीवन संभव नहीं। आदिवासी समाज सदियों से जिस प्रकृति-पूजक परंपरा को जी रहा है, वह आधुनिक समाज के लिए एक प्रेरणा है।
अंततः, सरहुल केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि जीवन का दर्शन है जहां प्रकृति, मनुष्य और ईश्वर के बीच गहरा सामंजस्य स्थापित होता है। यह नवजीवन, आशा, समृद्धि और सामूहिकता का ऐसा उत्सव है, जो हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है और भविष्य के लिए मार्गदर्शन भी देता है।
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