राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ विजयादशमी के दिन अपना 100 वर्ष पूरा करने जा रहा है। विजयादशमी के दिन 27 सितंबर 2025 को संघ की नागपुर में स्थापना हुई थी। शताब्दी वर्ष पूरा होने के उपलक्ष्य में संघ अपनी कई योजनाओं, कार्यक्रमों और प्रबोधनों पर अमल करने जा रहा है। उसमें मंडलों और छोटी-छोटी बस्तियों तक पहुंचना, विभिन्न तरह के कार्यक्रमों का आयोजन करना, संघ से आम लोगों को जोड़ना, अपना लक्ष्य निर्धारित किया है। साल भर तक चलनेवाले इन कार्यक्रमों की रूपरेखा को अंतिम रूप दिया जा रहा है। इस निमित्त संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख नरेंद्र ठाकुर पिछले दो दिनों से रांची प्रवास पर हैं। निवारणपुर स्थित कार्यालय में संघ के विभिन्न विभाग, प्रभाग के पदाधिकारियों, स्वयं सेवकों के साथ बैठ कर शताब्दी वर्ष में होनेवाले कार्यक्रमों की रूपरेखा और कार्य योजनाओं को अंतिम रूप दे रहे है। इसके बाद विजयादशमी के दिन से रांची सहित पूरे झारखंड में शताब्दी समारोह का शुभारंभ किया जाएगा। यह अभियान अगले साल विजयादशमी तक चलेगा।
संघ की स्थापना का 75 वर्ष पूरा होने पर जिला स्तर पर कार्यक्रमों और विचार गोष्ठियों के माध्यम से अपने विस्तार को आगे बढ़ाया गया था। इस बार संघ का 100 वर्ष पूरा होने पर गोष्ठियों, कार्यक्रमों को मंडल और छोटी-छोटी बस्तियों तक ले जाना है। बस्तियों और मंडलों में होनेवाले कार्यक्रमों में उस क्षेत्र के स्वयं सेवकों के अलावा प्रबुद्ध नागरिकों, समाज सेवियों और प्रभावशाली लोगों को जोड़ने की भी योजना है। यूं कहें कि हर उस घर तक संघ का विस्तार करना है, जहां तक अभी संघ नहीं पहुंच सका है। घर घर जाकर आम लोगों को संघ के उद्देश्यों को मौखिक और लिखित रूप से बताने की भी योजना है।
संघ का विस्तार
पिछले 100 वर्षों में संघ का राष्ट्रीय स्तर पर बहुत बड़ा विस्तार हुआ है। देश भर में 51740 स्थानों पर प्रतिदिन 83129 शाखाएं आयोजित की जा रही हैं। 21936 स्थानों पर 22866 साप्ताहिक मिलनों के माध्यम से संघ का देशव्यापी विस्तार हुआ है। इसके अलावा स्वयं सेवक समाज के सहयोग से स्वास्थ्य, शिक्षा, संस्कार और स्वावलंबन के विषयों पर ग्रामीण और नगरीय क्षेत्रों में 129000 सेवा कार्य एवं गतिविधियां चला रहे हैं। इस प्रयास को और आगे ले जाना शताब्दी वर्ष का मुख्य लक्ष्य है।
पंच परिवर्तन पर विशेष फोकस
शताब्दी वर्ष में पहले से चले आ रहे पंच परिवर्तन पर विशेष फोकस करने की योजना है।
सामाजिक समरसता-समाज में ऊंच-नीच, स्पृश्य-अस्पृश्य, जाति-भेद, जन्म आधारित भेदभाव से ऊपर उठ कर सामाजिक समरसता को स्थापित करने का हर संभव प्रयास करना है।
पर्यावरण संरक्षण-पर्यावरण संरक्षए के लिए पर्यावरण के अनुकूल अपनी जीवन-शैली औरउसमें व्यक्तिगत, पारिवारिक एवं राष्ट्रीय दृष्टि समाहित कर दैनंदिन व्यवहार में बदलाव पर जोर देना है।
कुटुंब प्रबोधन-हिंदू परिवार में हिंदू विचार एवं जीन शैली को विकसित करते हुए परिवार कैसे चलाना है, उसके क्या कर्तव्य हैं, परिवार का क्या महत्व है, इस पर आम लोगों को गहनता से विचार करने के लिए बाध्य करना है।
स्व आधारित जीवन-जीवन के हर क्षेत्र में विदेशी दासता से मुक्त होकर स्व भाषा, भूषा और स्वदेशी को प्रोत्साहित करना भी शताब्दी वर्ष की कार्य योजना है।
नागरिक कर्तव्य बोध और शिष्टाचार-नित्य जीवन में एक अच्छे नागरिक के नाते राष्ट्र और समाज हित में जिम्मेदारी का बोध कराना भी शताब्दी वर्ष की योजना का अंग है।
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