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एनटीपीसी मजदूर यूनियन एटक पीवीयूएनएल शाखा पतरातू केचार लेबर कोड रद् विरोध में मार्च निकाला।

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Khabar365news

रिपोर्ट- सुमित कुमार पाठक पतरातु

एनटीपीसी मजदूर यूनियन एटक पीवीयूएनएल शाखा पतरातू के द्वारा 4 लेबर कोड को लेकर पीटीपीएस यूनियन ऑफिस से कटिया चौक तक गगन भेदी नारे लगाते हुए चार लेबर कोड रद् करो, मजदूरों को गुलाम बनाना बंद करो, पूंजीपतियों की सरकार मुर्दाबाद मजदूरों के अधिकार छिन्नना बंद करो ,चार लेबर कोड वापस करो आदि नारे लगाते हुए विरोध मार्च निकाला

यह मार्च कटिया चौक में जाकर सभा में तब्दील हो गई एवं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पुतला दहन किया गया साथ ही चार लेबर कोड के प्रतीया भी जलाई गई ।वही कामरेड मनोज कुमार महतो ने कहा कि 21 नवंबर 2025 को जो नरेंद्र मोदी सरकार के द्वारा चार लेबर कोड देशभर में लागू किए गए हैं उसको लेकर एनटीपीसी मजदूर यूनियन एटक आंदोलन को तेज करेंगी। यह कानून मजदूरों को गुलाम बनाने वाला कानून है इस कानून में मजदूरों को हड़ताल करने की अधिकार खत्म कर दिया गया है लेबर कोड और उनके नुकसान

  1. मज़दूरी संहिता (Wage Code)
    मालिकों को न्यूनतम मज़दूरी देने से बचने के कई रास्ते देता है।
    8 घंटे से ज़्यादा काम करवाने की खुली छूट, वह भी बिना ओवरटाइम भुगतान के।
    मज़दूरों की आय और काम की शर्तें और ज़्यादा असुरक्षित हो जाती हैं।
  2. व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य व कार्यस्थल स्थिति संहिता (OSH Code)
    असंगठित मज़दूरों की इसमें कोई जगह नहीं।
    यह केवल उन संस्थानों पर लागू होगा जिनमें 10 से अधिक मज़दूर हों — यानी बड़ी आबादी पूरी तरह कानून से बाहर।
    मालिकों को अमानवीय व असुरक्षित कार्यस्थितियाँ देने का मौका मिल जाता है।
  3. सामाजिक सुरक्षा व पेशागत सुरक्षा संहिता (Social Security Code)
    ईएसआई, पीएफ़, ग्रैच्युटी, पेंशन, मातृत्व लाभ आदि अब सरकार/मालिक की बाध्यताकारी ज़िम्मेदारी नहीं रहेंगे।
    ये लाभ केवल केन्द्र या राज्य सरकार द्वारा जारी नोटिफिकेशन पर निर्भर होंगे — यानी अनिश्चितता बढ़ेगी।
    मज़दूरों की सामाजिक सुरक्षा पूरी तरह कमजोर कर दी गई है।
  4. औद्योगिक सम्बन्ध संहिता (Industrial Relations Code)
    रोज़गार सुरक्षा लगभग समाप्त — मालिक जब चाहे भर्ती करें और जब चाहे निकाल दें।
    300 तक मज़दूरों वाले कारख़ानों को लेऑफ़/छँटनी के लिए सरकार से अनुमति लेने की ज़रूरत नहीं (पहले सीमा 100 थी)।
    हड़ताल से पहले 60 दिन का नोटिस अनिवार्य — संघर्ष का अधिकार सीमित।
    ठेका प्रथा को पूरी तरह कानूनी बना दिया गया।
    मज़दूरों को लगभग ग़ुलामी जैसी परिस्थितियों में धकेल दिया जाएगा।
    90% अनौपचारिक मज़दूरों की स्थितियाँ और भी बदतर होंगी।
    पुराने श्रम कानून भले पूरी तरह लागू न होते थे, पर वे संघर्ष और अदालत में राहत का आधार थे — अब वे अधिकार ही खत्म कर दिए गए हैं।
    नई संहिताएँ कॉरपोरेट और बड़े पूँजीपतियों को मज़दूरों के खुले शोषण की छूट देती हैं।
    मालिक बिना जीवनयापन योग्य मज़दूरी, बिना सामाजिक सुरक्षा और बिना गरिमामय कार्यस्थितियाँ दिए मज़दूरों से काम करा सकते हैं। इस मौके पर मनोज पहान रमेश महतो नरेश बेदिया, किशोर कुमार महतो सतनारायण सिंह, विक्की कुमार, शिव मिंज, प्रदीप सिंह सनी लाल , सुरेंद्र महतो फुलेश्वर महतो ,ओमप्रकाश साहू, आनंद साहू ,रूपेश साहू विनय गुप्ता आदि मौजूद थे।
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