पाकुड़ से जितेन्द्र यादव की रिपोर्ट
हिरणपुर प्रखंड की शांत रातें अब चैन की नहीं रहीं। अंधेरा होते ही जब लोग दिनभर की थकान उतारकर आराम की उम्मीद करते हैं, तभी ग्राम बस्टाडीह के समीप संचालित मोर मुकुट क्रेशर की मशीनें दहाड़ने लगती हैं। लोहे की मशीनों की यह गूंज न केवल नींद छीन लेती है, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य पर भी गहरा प्रहार कर रही है।
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि क्रेशर रात भर बिना किसी रोक-टोक के चलता है, जिससे पूरा इलाका ध्वनि प्रदूषण और उड़ती धूल की चपेट में आ जाता है। हवा में घुली पत्थर की महीन डस्ट सांसों के जरिए लोगों के शरीर में प्रवेश कर रही है, जो धीरे-धीरे गंभीर बीमारियों का कारण बनती जा रही है।
बीमारी बनकर शरीर में घुस रही धूल
बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं सबसे अधिक प्रभावित हैं। आंखों में जलन, सांस लेने में तकलीफ, खांसी, एलर्जी और त्वचा रोग आम बात हो चुकी है। ग्रामीणों का कहना है कि घर के अंदर रखा पानी, भोजन और कपड़े तक धूल से ढक जाते हैं। ऐसे में साफ-सुथरा जीवन जीना दूभर हो गया है।
नियम कागज़ों में, ज़मीन पर शून्य
नियमों के अनुसार, किसी भी स्टोन क्रेशर के संचालन के लिए:
चारों ओर ऊँची दीवार या टीन शेड होना अनिवार्य है
डस्ट कंट्रोल सिस्टम और नियमित सुबह-शाम पानी का छिड़काव जरूरी है
पर्यावरण सुरक्षा के लिए सघन पौधारोपण होना चाहिए
रिहायशी इलाके से पर्याप्त दूरी बनाए रखना आवश्यक है
लेकिन बस्टाडीह के पास संचालित मोर मुकुट क्रेशर में इन नियमों का पालन होता हुआ कहीं नजर नहीं आता।
न तो धूल रोकने की व्यवस्था है, न ही पौधारोपण, और न ही नियमित सिंचाई।
इससे यह सवाल उठने लगे हैं कि
क्या क्रेशर किसी “ऊपरी संरक्षण” में चल रहा है?
आखिर किसकी अनुमति से रात भर मशीनें चल रही हैं?
प्रशासनिक आदेशों की खुलेआम अवहेलना
बताया जाता है कि जिले के उपायुक्त मनीष कुमार द्वारा पर्यावरण संरक्षण और अवैध खनन पर सख्त निर्देश दिए गए हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत इन आदेशों की धज्जियां उड़ाती नजर आ रही है। अवैध रूप से रात में क्रेशर चलाकर न सिर्फ नियमों का उल्लंघन हो रहा है, बल्कि प्रशासन की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
आम जनता पूछ रही है सवाल
आज हिरणपुर की जनता पूछ रही है—
क्या गरीबों की सेहत की कोई कीमत नहीं?
क्या प्रशासन सिर्फ कागज़ों में ही सक्रिय है?
क्या नियम सिर्फ छोटे लोगों के लिए हैं?
जब तक इन सवालों का जवाब कार्रवाई के रूप में नहीं मिलता, तब तक बस्टाडीह और आसपास के गांवों के लोग शोर, धूल और बीमारी के साए में जीने को मजबूर रहेंगे।
अब देखना यह है कि पाकुड़ प्रशासन इस गंभीर मामले पर कब संज्ञान लेता है, या फिर मोर मुकुट क्रेशर यूं ही रात के अंधेरे में नियमों को कुचलता रहेगा।
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