गिरिडीह में गरीब आदिवासी के आबुआ आवास तोड़े जाने के मामले में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने संज्ञान लिया है। दरअसल वनपाल ने लाभुक को नोटिस दिए बिना आवास तोड़ दिया। तर्क दिया कि मकान वनभूमि पर बनाया जा रहा था। पीड़ित परिवार का आरोप है कि यह कार्रवाई इसलिए हुई क्योंकि वे अपना सपनों का आशियाना बचाने की कीमत, 30 हजार रुपये वनपाल को अदा नहीं कर पाए। पूरी घटना गिरिडीह के गांडेय विधानसभा क्षेत्र में सदर प्रखंड अंतर्गत बदगुन्दाखुर्द पंचायत की है। दावा है कि गरीब आदिवासी परिवार का आशियाना केवल इसलिए उजाड़ दिया गया क्योंकि वे वनपाल को रिश्वत नहीं दे पाये। इस घटना पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने संज्ञान लिया है। द फॉलोअप की खबर पर संज्ञान लेते हुए उन्होंने गिरिडीह के उपायुक्त को निर्देश देते हुए कहा कि मामले की तुरंत जांच कर उचित कार्रवाई की जाए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि किसी का घर तोड़ना किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और दोषियों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई होगी जो उदाहरण बने। वहीं, गिरिडीह के उपायुक्त ने मुख्यमंत्री को आश्वस्त किया है कि मामले को गंभीरता से लिया गया है। जांच के लिए अधिकारियों की टीम गठित कर दी गई है और जांच पूरी होने के बाद दोषियों पर कड़ी एवं उचित कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।
अबुआ आवास बनाने के एवज में 30 हजार रिश्वत की मांग
पीड़ित तुढ़ा टुडू की पत्नी का आरोप है कि वनपाल ने उनसे आबुआ आवास बनाने के एवज में 30 हजार रुपये की रिश्वत मांगी थी। उन्होंने पैसे देने से इनकार कर दिया तो बदले की नीयत से रात के अंधेरे में बिना किसी चेतावनी के उनका निर्माणाधीन मकान ढहा दिया। हैरानी की बात है कि जब ग्रामीणों ने संबंधित अधिकारी से शिकायत की तो उन्होंने इसे आपस का मामला बताते हुए चंदा इकट्ठा करने की सलाह दी। इसे सरकारी सिस्टम की असंवेदनशीलता नहीं तो और क्या कहा जायेगा। बातचीत का ऑडियो आप भी सुनिये।सवाल यदि नियमों का है तो फिर तुढ़ा टुडू का मकान ही क्यों। इसी जगह आसपास कई और मकान भी वन भूमि पर बने हैं, लेकिन बुलडोजर किसी चिन्हित गरीब आदिवासी के आशियाने पर ही चला। स्थानीय लोगों में इस कार्रवाई के खिलाफ गहरा आक्रोश है।
Leave a comment