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पाकुड़ कल्याण विभाग में 12.38 करोड़ का महाघोटाला उजागर, कर्मियों–ठेकेदारों की मिलीभगत से वर्षों तक चलता रहा खेल, एफआईआर दर्ज

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Khabar365news

पाकुड़ से जितेन्द्र यादव की रिपोर्ट

पाकुड़। पाकुड़ जिले के कल्याण विभाग में 12 करोड़ 38 लाख 66 हजार रुपये के महाघोटाले का सनसनीखेज खुलासा हुआ है। विभाग के ही कर्मियों और लाभुकों की संगठित साजिश के जरिए सरकारी खाते से फर्जी दस्तावेजों के आधार पर करोड़ों रुपये की अवैध निकासी की गई। मामले में नगर थाना में प्राथमिकी दर्ज कर पुलिस ने जांच शुरू कर दी है।

संदिग्ध हस्ताक्षर से खुली पोल

इस महाघोटाले का पर्दाफाश 8 दिसंबर को हुआ, जब एसबीआई बाजार शाखा के प्रबंधक अभिनव कुमार ने कल्याण पदाधिकारी अरुण कुमार एक्का को फोन कर बताया कि उनके द्वारा भेजे गए एक एडवाइस पर किया गया हस्ताक्षर बैंक में उपलब्ध नमूना हस्ताक्षर से मेल नहीं खा रहा है।
साथ ही एडवाइस लेकर बैंक पहुंचे कर्मचारी अक्षय रविदास की भूमिका भी संदिग्ध प्रतीत हुई।

कर्मियों की भागदौड़, बढ़ता गया शक

हस्ताक्षर पर सवाल उठते ही विभाग के कंप्यूटर ऑपरेटर सूरज कुमार केवट और कार्यालय अधीक्षक मानवेंद्र झा बैंक पहुंचे। अधीक्षक एडवाइस को अपने साथ लेकर यह कहकर निकल गए कि “दूसरा एडवाइस लाते हैं”, लेकिन इसके बाद बैंक वापस नहीं लौटे।
इस बीच शाखा प्रबंधक लगातार पदाधिकारी से संपर्क में रहे, जबकि अधीक्षक ने बैंक कर्मियों को गुमराह करते हुए कहा कि पदाधिकारी आवास चले गए हैं। इस घटनाक्रम से बैंक प्रबंधन का शक और गहराता चला गया।

एडवाइस फाड़कर सबूत मिटाने की कोशिश

कल्याण पदाधिकारी द्वारा सख्ती से पूछताछ किए जाने पर करीब 15 घंटे बाद कंप्यूटर ऑपरेटर सूरज कुमार केवट ने स्वीकार किया कि संदिग्ध एडवाइस को फाड़कर नष्ट कर दिया गया है। इससे साफ हो गया कि पूरे मामले में साक्ष्य छिपाने की सुनियोजित कोशिश की गई।

जांच में सामने आया 12.38 करोड़ का गबन

इसके बाद 1 फरवरी 2025 से अब तक खाते संख्या 11440445629 का पूरा बैंक स्टेटमेंट मंगाया गया।
विभागीय जांच टीम (राकेश रंजन सोरेन, मोहम्मद तहसीन और मोहम्मद ईर्तिका) ने जब विवरणी का मिलान किया तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए।
कई एडवाइस में दर्ज पत्र संख्या, तिथि और निर्गत पंजी आपस में मेल नहीं खा रहे थे। इसी आधार पर 12 करोड़ 38 लाख 66 हजार रुपये की अवैध निकासी की पुष्टि हुई।

पूर्व पदाधिकारी के कार्यकाल पर भी सवाल

एफआईआर में यह भी उल्लेख है कि 1 फरवरी से पहले, तत्कालीन कल्याण पदाधिकारी लक्ष्मण हरिजन के कार्यकाल में भी इसी तरह की फर्जी निकासी के संकेत मिले हैं।
बैंक द्वारा उपलब्ध कराए गए 74 एडवाइस में से 7 एडवाइस ऐसे पाए गए, जिनकी तिथि और पंजी का मिलान नहीं हो रहा है।

विरमित कर्मी फिर भी बैंक पहुंचा

मामले को और गंभीर बनाते हुए एफआईआर में दर्ज है कि आरोपी अक्षय रविदास को 4 दिसंबर को ही अनुसूचित जनजाति विद्यालय, डुमरचिर से विरमित किया जा चुका था, इसके बावजूद वह 8 दिसंबर को एडवाइस लेकर बैंक पहुंचा। यह तथ्य घोटाले की गहराई और साजिश को उजागर करता है।

एसबीआई अधिकारियों की भूमिका भी संदिग्ध

कल्याण पदाधिकारी अरुण कुमार एक्का ने स्पष्ट रूप से कहा है कि इस पूरे घोटाले में एसबीआई के कुछ अधिकारियों की मिलीभगत से भी इंकार नहीं किया जा सकता। बैंक स्तर से भी गहन जांच की आवश्यकता बताई गई है।

इन पर दर्ज हुआ मामला

सोची-समझी साजिश के तहत फर्जी दस्तावेज बनाकर सरकारी राशि की निकासी के आरोप में कांड संख्या 319/25 के तहत बीएनएस की विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया गया है।
आरोपियों में—
कार्यालय अधीक्षक मानवेंद्र झा,
कंप्यूटर ऑपरेटर सूरज कुमार केवट,
अनुसेवक अक्षय रविदास सहित
कई खाताधारी, लाभुक व फर्म संचालक शामिल हैं।

जांच में जुटी पुलिस

नगर थाना पुलिस पूरे मामले की जांच में जुट गई है। दस्तावेजों की फॉरेंसिक जांच, बैंक रिकॉर्ड का मिलान और सभी आरोपियों की भूमिका खंगाली जा रही है। आने वाले दिनों में बड़े खुलासे और गिरफ्तारियां होने की संभावना जताई जा रही है।

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