
आलेख- दयानंद कुमार, समाजसेवी, हजारीबाग
मेहता समाज संख्या में भले ही छोटा हो, लेकिन प्रतिभा और परिश्रम के बल पर इस समाज के लोगों ने हजारीबाग से निकलकर राज्य, देश और विदेशों में अपनी पहचान बनाई है। यह पूरे समाज के लिए गर्व की बात है। लेकिन आज उसी समाज का भविष्य चिंता का विषय बनता जा रहा है। बीते कुछ समय से यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि मेहता समाज में एकता कमजोर पड़ रही है।
जिन लोगों ने वर्षों की मेहनत से समाज को संगठित किया, आज उसी समाज में विभाजन की स्थिति उत्पन्न हो रही है। यह स्थिति समाज के लिए शुभ संकेत नहीं है। दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि समाज को कमजोर करने में बाहरी ताकतों से अधिक, कहीं न कहीं हमारे अपने ही लोग जिम्मेदार बनते जा रहे हैं। पद, प्रतिष्ठा और कुर्सी की लालसा समाजहित पर भारी पड़ती दिख रही है। जबकि समाज सेवा का मूल उद्देश्य निस्वार्थ भाव और समर्पण होना चाहिए।
विगत दिनों इचाक प्रखंड क्षेत्र में मेहता समाज की एक विशेष सभा आयोजित की गई। इस सभा में समाज के ही कुछ लोगों के खिलाफ सार्वजनिक रूप से अपमानजनक वक्तव्य दिए गए। यह किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे समाज की गरिमा का प्रश्न है। भरी सभा में मंच से समाज के ही लोगों को अपमानित करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता।
जागरूकता संवाद से आती है, अपमान से नहीं। ऐसे वक्तव्यों से समाज के भीतर द्वेष, ईर्ष्या और अविश्वास की भावना जन्म लेती है, जिससे समाज और अधिक कमजोर होता है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि समाज के भीतर बढ़ते इस आपसी मतभेद का लाभ तीसरे पक्ष उठाते हैं। इतिहास गवाह है कि जब समाज आपस में बंटता है, तब बाहरी लोग उसी विभाजन को अपने हित में इस्तेमाल करते हैं। इसके अलावा, जब समाज की बैठक सर्वसम्मति से हो चुकी हो और सामूहिक निर्णय लिया जा चुका हो, तो उसके बाद पुनः समाज को विभाजित करने के उद्देश्य से नई बैठक कर कमेटी बनाना उचित नहीं कहा जा सकता। ऐसे प्रयास समाज की एकता को नुकसान पहुंचाते हैं।
भविष्य की पीढ़ी के लिए चेतावनी यदि समय रहते समाज ने आत्ममंथन नहीं किया, तो इसका सीधा असर आने वाली पीढ़ियों पर पड़ेगा। बच्चे वही सीखते हैं, जो वे समाज में देखते हैं। बंटवारा और आपसी द्वेष उन्हें नकारात्मक दिशा में ले जा सकता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि मेहता समाज मतभेद भुलाकर एकजुट हो।
पद और प्रतिष्ठा से ऊपर उठकर एक मंच पर आए और समाजहित को सर्वोपरि रखे। क्योंकि यह सत्य है अगर हम बिखरेंगे, तो लोग हमें तोड़ेंगे और अगर हम जुड़ेंगे, तो हमें तोड़ने से पहले सौ बार सोचेंगे। समय की मांग है कि समाज के सभी लोग गंभीर चिंतन करें और एकजुटता का परिचय दें, ताकि आने वाली पीढ़ियों को एक मजबूत और सम्मानित समाज मिल सके।
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