रिपोर्ट – सुमित कुमार पाठक पतरातु
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय बी04, रोड़ नंबर-08, पीटीपीएस, पतरातू में बुधवार को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव कार्यक्रम हर्षोल्लास के साथ संपन्न हुआ। कार्यक्रम में ब्रह्माकुमारी रोशनी,गीता देवी वा बीके रामदेव ने श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष व्याख्यान दिए।
पतरातू सेवाकेंद्र की संचालिका ब्रह्माकुमारी रोशनी बहन ने कहा कि हर वर्ष भारत में जन्माष्टमी के दिन
श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। हरेक माता अपने बच्चे को नयनों का तारा और दिल का दुलारा समझती है, परंतु फिर भी वह श्रीकृष्ण को सुंदर, मनमोहन, चित्तचोर आदि नामों से पुकारती है। वास्तव में, श्रीकृष्ण का सौंदर्य चित्त को चुरा ही लेता है।
जन्माष्टमी के दिन जिस बच्चे को मोर-मुकुट पहनाकर, मुरली हाथ में देते हैं, लोगों का मन उस समय उस बच्चे के नाम, रूप, देश व काल को भूलकर कुछ क्षणों के लिए श्रीकृष्ण की ओर आकर्षित हो जाता है। सुंदरता तो आज भी बहुत लोगों में पाई जाती है, परंतु श्रीकृष्ण सर्वांग सुंदर थे, सर्वगुण सम्पन्न, सोलह कला सम्पूर्ण थे। ऐसे अनुपम सौंदर्य तथा गुणों के कारण ही श्रीकृष्ण की मूर्ति भी चित्तचोर बन जाती है।आगे उन्होंने कहा कि
इस कलियुगी सृष्टि में एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं होगा जिसकी वृत्ति, दृष्टि कलुषित न बनी हो, जिसके मन पर क्रोध का भूत सवार न हुआ हो अथवा जिसके चित्त पर मोह, अहंकार का धब्बा न लगा हो।
परंतु श्रीकृष्ण ही ऐसे थे जिनकी दृष्टि, वृत्ति कलुषित नहीं हुई, जिनके मन पर कभी क्रोध का प्रहार नहीं हुआ, कभी लोभ का दाग नहीं लगा। ये नष्टोमोहा, निरहंकारी तथा मर्यादा पुरुषोत्तम थे।उनको सम्पूर्ण निर्विकारी कहने से ही सिद्ध है कि उनमें किसी प्रकार का रंचक मात्र भी विकार नहीं था। जिस तन की मूर्ति सजाकर मंदिर में रखी जाती है, उसका मन भी तो मंदिर के समान था। श्रीकृष्ण केवल तन से ही देवता नहीं थे, उनके मन में भी देवत्व था।
गीता देवी ने कहा कि जिस श्रीकृष्ण के चित्र को देखते ही नयन शीतल हो जाते हैं, जिसकी मूर्ति के चरणों पर जल डालकर लोग चरणामृत पीते हैं और उससे ही अपने को धन्य मानते हैं, यदि वे वास्तविक साकार रूप में आ जाएँ तो कितना सुखमय, आनंदमय, सुहावना समय हो जाए!श्रीकृष्ण पर मिथ्या कलंकश्रीकृष्ण, जिनके लिए गायन है कि वे सोलह कला सम्पूर्ण, सम्पूर्ण निर्विकारी, परम अहिंसक, मर्यादा पुरुषोत्तम थे, जिनमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार अंशमात्र भी नहीं थे, जिनकी भक्ति से अथवा नाम लेने से ही भक्त लोग विकारी वासनाओं पर विजय पाते हैं, उन पर लोगों ने अनेक मिथ्या कलंक लगाए हैं।
राजयोग मेडिटेशन प्रशिक्षक ने कहा कि श्रीकृष्ण की 16,108 रानियाँ थीं, वह हर रानी के कमरे में एक ही समय पर उपस्थित होते थे तथा कृष्ण जी से उनके 10-10 पुत्र थे,अर्थात् श्रीकृष्ण जी के 1,61,080 पुत्र हुए।विचार करने की बात है, क्या ऐसा इस साकार लोक में संभव है? श्रीकृष्ण तो सर्वोच्च देवात्मा थे जिनमें कोई भी विकार लेशमात्र भी न था, जिनकी भक्ति से मीरा ने कामवासना पर विजय पाई और सूरदास, जिन्हें संन्यासोपरांत आँखों ने धोखा दिया, उन्हें भी श्रीकृष्ण की भक्ति कर अपनी अपवित्र कामी दृष्टि को पवित्र बनाने का बल मिला।ऐसी पवित्र आत्मा पर, जिनके स्मरण से ही विकारी भावनाएँ समाप्त हो जाती हैं क्या ये मिथ्या कलंक लगाना उचित है?इसके अतिरिक्त यह भी कहा जाता है कि श्रीकृष्ण ने द्वापर युग में महाभारत युद्ध करवाया, जिससे आसुरी दुनिया का नाश हुआ और स्वर्ग की स्थापना हुई। परंतु द्वापर युग के बाद तो कलियुग अर्थात् कलह-क्लेश का युग ही आया। इसमें तो और ही पाप तथा भ्रष्टाचार बढ़ा।
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