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जामताड़ा के ग्रेजुएट किसान बना रहे नई पहचान

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जामताड़ा में 10 से 15 ग्रेजुएट युवा नौकरी की तलाश में भटकते-भटकते थक गए. इसके बाद इन सभी ने अपनी जमीन में पसीना बहाया और सालाना लाखों के कमाई करने लगें. जिला मुख्यालय से महज 11 किलोमीटर दूर स्थित उदलबनी पंचायत का आसानचुवा गांव आज चर्चा का विषय है. यहां की मिटटी सिर्फ फसल नहीं बल्कि आत्मनिर्भर भारत’ की नई मिसाल पेश कर रही है. 

गांव के किसान इंद्रजीत महतो स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद कई वर्षों तक नौकरी के लिए भटकते रहे. अंत में उन्होंने खेती को ही अपना करियर चुना. आज वे करीब 3-4 बीघे में भिंडी, कद्दू, खीरा और झींगा जैसी सब्जियां उगा रहे हैं. इंद्रजीत अकेले नहीं हैं; उनकी पत्नी भी ग्रेजुएट हैं और वे खेती के साथ-साथ पशुपालन में उनका पूरा साथ देती हैं. इसी तरह नवल किशोर महतो भी 5 बीघे जमीन पर आधुनिक तरीके से सब्जी उत्पादन कर रहे हैं.

सोलर प्लांट और सरकारी कुएं की किसान कर रहे मांग
हैरानी की बात यह है कि इन किसानों को सरकार या कृषि विभाग से कोई आर्थिक सहायता या सुविधा नहीं मिलती. किसानों का कहना है कि कृषि विभाग से लेकर ब्लॉक एवं अन्य  विभाग को सोलर प्लांट और सरकारी कुएं के लिए 15-20 बार आवेदन देने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई. विभाग के अधिकारी और एनजीओ के लोग आते तो हैं, लेकिन केवल फसलों के साथ फोटो खिंचवाकर अपनी उपलब्धियां गिनाने के लिए. धरातल पर बीज से लेकर खाद तक, सब किसान खुद के खर्च पर खरीदते हैं. यहां तक की यह लोग खुद कुआं खोदकर सिंचाई करते हैं या नहीं तो नदी से पंप के माध्यम से सिंचाई करने को मजबूर है, लेकिन नदी का भरोसा कम रहता है क्योंकि पानी नदी में सूख जाने के कारण इन लोग का फसल का भी नुकसान हो जाता है.

पश्चिम बंगाल में सब्जियों का मिलता है बढ़िया दाम
आसानचुवा की हरी सब्जियों की चमक पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल तक फैली हुई है. किसानों के अनुसार, जामताड़ा की तुलना में बंगाल में उन्हें बेहतर दाम मिलते हैं. उदाहरण के तौर पर, जो भिंडी स्थानीय बाजार में 60 रुपये प्रति किलो बिकती है, वही बंगाल के बाजारों में 100 रुपये तक बिक जाती है. यही कारण है कि यहां के किसान अपनी उपज का बड़ा हिस्सा बंगाल भेजते हैं. अगर इन मेहनती ग्रेजुएट किसानों को सिंचाई के लिए सोलर पंप और कुएं जैसी बुनियादी सुविधाएं मिल जाएं, तो इनकी पैदावार और आय चार गुना तक बढ़ सकती है. आसानचुवा के ये किसान साबित कर रहे हैं कि यदि हौसला बुलंद हो, तो सरकारी बैसाखियों के बिना भी कामयाबी की फसल काटी जा सकती है.

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