झारखंड की जेलों में कैदियों के लिए शुरू हों जीवन कौशल शिक्षा की कक्षाएँ। राष्ट्रपति से सम्मानित NSS राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता दिवाकर आनंद ने DGP को भेजा प्रस्ताव पत्र ।
झारखंड की जेलों में बंद कैदियों के व्यक्तित्व विकास, मानसिक एवं सामाजिक सुधार तथा पुनर्वास को लेकर एक महत्वपूर्ण पहल के लिए झारखंड के युवा व देश की माननीय राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू के द्वारा एनएसएस राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित दिवाकर आनंद ने राज्य की जेलों में बंद कैदियों के लिए नियमित रूप से Life Skills Education (जीवन कौशल शिक्षा) की कक्षाएँ प्रारंभ करने की मांग की है। इस संबंध में उन्होंने झारखंड की पुलिस महानिदेशक (DGP) महोदया को एक औपचारिक प्रस्ताव भेजा है।
दिवाकर आनंद ने अपने प्रस्ताव में कहा है कि जेल केवल सजा देने का स्थान नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे आत्मचिंतन, आत्मसुधार और सकारात्मक बदलाव का केंद्र भी बनाया जाना चाहिए। किसी व्यक्ति से गलती होने के बाद उसे कानून के अनुसार दंड मिलना आवश्यक है, लेकिन उसके साथ-साथ उसे अपने व्यवहार, विचार और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का अवसर भी मिलना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया है कि जेलों में जीवन कौशल शिक्षा के माध्यम से कैदियों को आत्म-जागरूकता, भावनात्मक प्रबंधन, क्रोध एवं तनाव नियंत्रण, सकारात्मक सोच, निर्णय लेने की क्षमता, समस्या समाधान, संवाद कौशल, सहानुभूति तथा नशामुक्ति जैसे महत्वपूर्ण विषयों की शिक्षा दी जाए। इस पहल का मुख्य उद्देश्य कैदियों के व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन लाना, उनके भीतर आत्मविश्वास एवं जिम्मेदारी की भावना विकसित करना तथा जेल से रिहा होने के बाद उन्हें समाज की मुख्यधारा से दोबारा जोड़ने में सहायता करना है।
दिवाकर आनंद का कहना है कि किसी भी व्यक्ति के जीवन में सुधार की संभावना कभी समाप्त नहीं होती। यदि कैदियों को सही मार्गदर्शन, शिक्षा और सकारात्मक वातावरण मिले, तो वे अपने जीवन को नई दिशा दे सकते हैं। जीवन कौशल शिक्षा इस दिशा में एक महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है। उन्होंने झारखंड पुलिस महानिदेशक से अनुरोध किया है कि राज्य की केंद्रीय एवं जिला जेलों में चरणबद्ध तरीके से इस कार्यक्रम की शुरुआत करने पर विचार किया जाए। इसके लिए प्रशिक्षित प्रशिक्षकों, सामाजिक संगठनों, एनजीओ एवं विशेषज्ञों का सहयोग भी लिया जा सकता है। दिवाकर आनंद ने कहा कि यह पहल केवल जेलों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसका व्यापक उद्देश्य एक संवेदनशील, जिम्मेदार, सुरक्षित और अपराधमुक्त समाज के निर्माण में योगदान देना है। सजा व्यक्ति को उसके अपराध का एहसास कराती है, लेकिन शिक्षा और सही मार्गदर्शन उसे बेहतर इंसान बनने का अवसर देते हैं।





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