पाकुड़ ब्यूरो जितेन्द्र यादव की रिपोर्ट
पाकुड़।
सुबह की पहली धूप पत्थर लोडिंग साइडिंग पर पड़ी, लेकिन हमेशा की तरह मशीनें नहीं चलीं। ट्रकों की लंबी कतारें बिना आवाज़ के खड़ी रहीं और मजदूर हाथ में चाय का गिलास लिए एक-दूसरे का चेहरा देखते रहे। यह कोई छुट्टी का दिन नहीं था, बल्कि उस ठहराव की शुरुआत थी, जिसने पूरे पाकुड़ और साहिबगंज क्षेत्र की धड़कन धीमी कर दी।
16 जनवरी से पत्थर व्यवसायियों द्वारा पत्थर लोडिंग पूरी तरह बंद कर दी गई है। पाकुड़ जिले की तीनों प्रमुख साइडिंग—जहां आम दिनों में दिन-रात हलचल रहती थी—आज वीरान दिख रही हैं। यह सन्नाटा सिर्फ मशीनों का नहीं है, यह भरोसे के टूटने का सन्नाटा है।
पत्थर उद्योग: इलाके की रीढ़, जो अचानक थम गई
पाकुड़ और आसपास का इलाका लंबे समय से पत्थर उद्योग के लिए जाना जाता है। हजारों परिवारों की रोज़ी-रोटी इसी से चलती है। मजदूर, ट्रक चालक, छोटे दुकानदार—सबकी जिंदगी इस उद्योग से जुड़ी है। लेकिन जब रेलवे से जुड़ी समस्याएं लगातार अनदेखी का शिकार होती रहीं, तो यह रीढ़ कमजोर होने लगी।
व्यवसायियों का कहना है कि बिना सुचारु रेल व्यवस्था के पत्थर उद्योग चलाना मुश्किल होता जा रहा है। माल तैयार है, लेकिन उसे भेजने की व्यवस्था भरोसेमंद नहीं। ट्रेनें कम हैं, ठहराव नहीं है और सुविधाओं का अभाव लगातार बढ़ता जा रहा है
यात्रियों की पीड़ा: सफर जो आसान नहीं रहा
रेलवे की समस्याएं सिर्फ कारोबार तक सीमित नहीं हैं। आम यात्रियों की परेशानी भी उतनी ही गंभीर है। छात्र पढ़ाई के लिए बाहर जाना चाहते हैं, लेकिन सीमित ट्रेनों और अनियमित समय के कारण उन्हें बार-बार दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। मरीजों को बड़े अस्पतालों तक पहुंचने में घंटों का इंतजार करना पड़ता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि कोविड काल में जिन ट्रेनों को बंद किया गया था, वे आज तक शुरू नहीं हो पाईं। एक्सप्रेस ट्रेनें इस रूट से गुजरती जरूर हैं, लेकिन पाकुड़ और साहिबगंज जैसे स्टेशनों पर ठहराव नहीं देतीं, जिससे यह इलाका मुख्यधारा से कटा-कटा सा महसूस करता है।
आंदोलन को मिला राजनीतिक समर्थन
इन हालातों के बीच आंदोलन को राजनीतिक समर्थन मिलने से माहौल और गर्म हो गया। झामुमो के केंद्रीय प्रवक्ता पंकज मिश्रा ने पाकुड़ पहुंचकर पत्थर व्यवसायियों के आंदोलन का समर्थन किया। उन्होंने साफ कहा कि जब तक रेलवे से जुड़ी मांगें पूरी नहीं होंगी, आंदोलन जारी रहेगा
पंकज मिश्रा ने चेतावनी दी कि यदि रेलवे प्रशासन ने जल्द कोई ठोस निर्णय नहीं लिया, तो 24 जनवरी से अमरापाड़ा से निकलने वाले कोयले की ढुलाई भी बंद कर दी जाएगी। यह बयान सिर्फ चेतावनी नहीं, बल्कि संघर्ष के अगले चरण का संकेत माना जा रहा है।
विधायकों की आवाज़: उपेक्षा अब नहीं चलेगी
लिट्टीपाड़ा विधायक हेमलाल मुर्मू ने कहा कि पाकुड़ और साहिबगंज जैसे जिलों की रेलवे लगातार उपेक्षा करता आ रहा है। उन्होंने इसे जनता के साथ अन्याय बताते हुए कहा कि बेहतर रेल सुविधाएं अब मांग नहीं, बल्कि अधिकार हैं।
वहीं महेशपुर विधायक प्रो स्टीफन मरांडी ने भी आंदोलन का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि रेलवे सुविधाओं की कमी का सीधा असर व्यवसाय, रोजगार और आम यात्रियों पर पड़ रहा है। यदि जल्द निर्णय नहीं लिया गया, तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा।
आगे क्या? सवाल हवा में
फिलहाल रेलवे प्रशासन या सरकार की ओर से कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला है। ऐसे में क्षेत्र में असमंजस की स्थिति बनी हुई है। लोग पूछ रहे हैं—क्या यह ठहराव लंबा चलेगा? क्या मांगों पर गंभीरता से विचार होगा? या फिर यह इलाका यूं ही इंतजार करता रहेगा?
पाकुड़ और साहिबगंज आज सिर्फ पत्थर लोडिंग या ट्रेन ठहराव की बात नहीं कर रहे। यह आंदोलन उस सम्मान और बराबरी की मांग है, जो हर क्षेत्र को मिलनी चाहिए।
पटरी बिछी है, इंजन मौजूद है—अब जरूरत है फैसले की, ताकि रफ्तार फिर लौट सके और यह सन्नाटा उम्मीद की आवाज़ में बदल सके।
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