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डायन-बिसाही प्रथा के खिलाफ कानूनी रूप से लड़ने वाले प्रेमचंद नहीं रहे

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अंधविश्वास की बेड़ियों में जकड़ी महिलाओं को सम्मान दिलाने के लिए अपना पूरा जीवन डायन बिसाही के खिलाफ लड़ने वाले सामाजिक कार्यकर्ता प्रेमचंद अब हमारे बीच नहीं रहे। जानकारी के मुताबिक, TMH में पिछले 25 दिनों से प्रेमचंद जिंदगी और मौत से लड़ रहे थे। बताते चलें कि प्रेमचंद आज शुक्रवार सुबह 9 बजे अंतिम सांस ली। 
दरअसल, प्रेमचंद की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं थी। प्रेमचंद का जन्म बिहार स्थित सासाराम के कुदरा में हुआ था। उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा बनारस से ली। बताते चलें कि प्रेमचंद इमरजेंसी आंदोलन में भी शामिल हुए थे। आंदोलन में जब पुलिस उनके पीछे पड़ी तो छिपते-छिपाते जमशेदपुर पहुंचे। जमशेदपुर पहुंचकर उन्होंने अपना नाम बदलकर झारखंड आंदोलन में भी योगदान दिया। 

दरअसल, इन सब से हटकर प्रेमचंद समाज सुधारक तब बने जब करनडीह नाम का एक गांव में साल 1991 डायन-बिसाही के आरोप में पिता-पुत्र की हत्या की गई और महिला को गांव से निकाला गया। इस घटना ने उन्हें झकझोर कर रख दिया। घटना के बाद उनसे नहीं गया और वे इस कुप्रथा के खिलाफ मैदान में कूद पड़े। तब से महिलाओं के शोषण और इस घिनौने अपराध के खिलाफ उनका आंदोलन लगातार जारी रहा। बताते चलें कि फ्री लीगल एंड कमेटी की अगुवाई करते हुए उन्होंने इस मुद्दे को मानवाधिकार आयोग तक पहुंचाया। वहीं, आयोग ने टीम भेजी, लेकिन रिपोर्ट आई कि डायन प्रथा जैसी कोई बात नहीं है।

इसके बाद प्रेमचंद दुखी भी हुए, पर हार नहीं माने। फिर साल 1995 में कुचाई में जब एक ही परिवार के 7 लोगों की हत्या हुई, तब सिंहभूम के तत्कालीन उपायुक्त अमित खरे के सहयोग से यह लड़ाई निर्णायक मोड़ पर पहुंची। यह प्रेमचंद के अटूट संघर्ष का ही परिणाम था कि 20 अक्टूबर 1999 को बिहार विधानसभा ने ‘डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम’ पास किया। बताते चलें कि अंधविश्वास के खिलाफ देश का यह दूसरा बड़ा कानून था। वहीं, आज यह कानून 6 राज्यों में लागू है और वे इसे 9 अन्य राज्यों में लागू कराने के लिए अंतिम समय तक संघर्षरत रहे।

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