रांची। राजनीति में महत्वाकांक्षा अक्सर नेताओं को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाती है, लेकिन कई बार यही महत्वाकांक्षा उनके लिए मुश्किलों का कारण भी बन जाती है। झारखंड की राजनीति में इन दिनों एक ऐसे ही नेताजी की चर्चा जोरों पर है, जो कभी सत्ता और संगठन दोनों के बेहद करीबी माने जाते थे, लेकिन आज उनकी राजनीतिक स्थिति पहले जैसी मजबूत नहीं दिख रही।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि नेताजी की नजर लंबे समय से एक बड़ी कुर्सी पर थी। इसके लिए उन्होंने सत्ता के केंद्र और सचिवालय के प्रभावशाली लोगों से नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश की। हालांकि इस रणनीति का फायदा मिलने के बजाय उनके पुराने राजनीतिक सहयोगियों और समर्थकों के साथ दूरी बढ़ती चली गई।
बताया जाता है कि संगठन के भीतर भी नेताजी की सक्रियता को लेकर सवाल उठने लगे। कई पुराने साथी खुद को उपेक्षित महसूस करने लगे। नतीजा यह हुआ कि जो लोग कभी उनके सबसे मजबूत समर्थक माने जाते थे, वे धीरे-धीरे उनसे किनारा करने लगे।
सियासी जानकारों का मानना है कि राजनीति में व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और संगठनात्मक संतुलन दोनों को साथ लेकर चलना पड़ता है। जब कोई नेता एक पक्ष को ज्यादा महत्व देता है तो दूसरे पक्ष में असंतोष बढ़ना स्वाभाविक हो जाता है। नेताजी के मामले में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है।
वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में नेताजी न तो संगठन में पहले जैसी पकड़ बना पा रहे हैं और न ही सत्ता के गलियारों में उन्हें वह स्थान मिल पा रहा है, जिसकी उन्हें उम्मीद थी। यही वजह है कि राजनीतिक चर्चाओं में अब यह कहा जाने लगा है कि कुर्सी की चाह में उन्होंने अपने कई पुराने रिश्ते कमजोर कर लिए और आज खुद को अपेक्षाकृत अकेला पा रहे हैं।
हालांकि राजनीति संभावनाओं का खेल है। आने वाले दिनों में परिस्थितियां बदल सकती हैं, लेकिन फिलहाल सत्ता और संगठन के बीच संतुलन साधने में चूक ने नेताजी की राह मुश्किल जरूर कर दी है।
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