गुमला जिले के घाघरा प्रखंड के सेरेंगदाग माइंस इलाके में शुक्रवार सुबह से ग्रामीणों का गुस्सा फूट पड़ा। लंबे समय से अनदेखी और बदहाली झेल रहे ग्रामीणों, रैयतों और मजदूरों ने मिलकर माइंस ऑफिस का ताला जड़ दिया और वहीं धरना पर बैठ गए। इस तालाबंदी के कारण पहाड़ पर खड़े सैकड़ों ट्रक फंस गए हैं और खनन और परिवहन की गतिविधियां पूरी तरह ठप हो चुकी हैं।
ग्रामीणों ने अपनी पहली और आखिरी मांग को स्पष्ट करते हुए कहा कि जब तक इलाके में पक्की सड़क का निर्माण नहीं होगा और मूलभूत सुविधाएं नहीं मिलेंगी, तब तक यह आंदोलन जारी रहेगा। उनका कहना था कि पिछले 51 साल से कंपनी बॉक्साइट का खनन कर रही है, लेकिन यहां के लोग अब भी उपेक्षा और बदहाली झेलने को मजबूर हैं। गर्मियों में धूल से लोग बीमार होते हैं और बरसात में सड़क तालाब जैसी बन जाती है।
ग्रामीणों ने बताया कि सड़क की जर्जर स्थिति ने उनके जीवन को असहनीय बना दिया है। पहाड़ से घाघरा मुख्यालय तक आने के लिए पुरुषों को हाफ पैंट पहनने और महिलाओं को कपड़ा घुटनों से ऊपर उठाकर चलने को मजबूर होना पड़ता है। उन्होंने सवाल उठाया, “क्या आदिवासी मान-सम्मान से जीने का अधिकार नहीं रखते?” सड़क की जर्जर स्थिति के कारण मरीजों को खाट पर लादकर अस्पताल तक ले जाना पड़ता है, जबकि स्वास्थ्य भवन बना तो है लेकिन अस्पताल कभी चालू नहीं हुआ। न तो डॉक्टर हैं, न दवा। शिक्षा की स्थिति भी खराब है, जहां बच्चों की जगह मवेशी बंधे रहते हैं। पीने के पानी की भी बड़ी समस्या है और महिलाएं पहाड़ी झरनों से पानी ढोने को मजबूर हैं। ग्रामीणों ने आरोप लगाया, “खनन से करोड़ों की कमाई होती है, लेकिन हमें बुनियादी सुविधाएं तक नहीं मिलतीं।”
महिलाओं ने बताया कि प्रसव के वक्त एंबुलेंस उपलब्ध नहीं होती। कंपनी बहाना बनाती है कि ड्राइवर नहीं है और सड़क खराब बताकर एंबुलेंस घाघरा से आने से मना कर देती है। कई बार प्रसव रास्ते में ही हो चुका है और महिलाओं की मौत तक हो चुकी है। महिलाओं ने कहा कि अब वे खामोश नहीं रहेंगी और अपनी लड़ाई जारी रखेंगी।
ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि जब भी उन्होंने आंदोलन किया, कंपनी ने उग्रवादी संगठनों के जरिए उन्हें दबाने का प्रयास किया। कई बार आंदोलनकारियों की पिटाई भी की गई और जमीन नहीं देने वाले ग्रामीणों से जबरन जमीन छीन ली गई। इस बार उन्होंने स्पष्ट किया कि वे डरने वाले नहीं हैं और आंदोलन को हर हाल में जारी रखेंगे।
ग्रामीणों ने सांसद और विधायकों पर भी आक्रोश जताया। उनका कहना था कि जनप्रतिनिधि केवल चुनाव के समय इलाके में आते हैं, बड़े-बड़े वादे करते हैं और वोट लेकर चले जाते हैं। चुनाव जीतने के बाद वे क्षेत्र को भूल जाते हैं। कई बार ग्रामीणों ने वोट बहिष्कार किया, लेकिन प्रशासन ने हर बार सिर्फ आश्वासन देकर उन्हें टाल दिया।
धरना स्थल पर “सड़क दो, अधिकार दो”, “सड़क बने बिना ताला नहीं खुलेगा”, “खनन से पहले विकास दो” जैसे नारे गूंजते रहे। इस आंदोलन में बड़ी संख्या में महिला और पुरुष ग्रामीण शामिल हुए। प्रमुख रूप से शामिल थे – राजेश उरांव, सुखनाथ उरांव, हरिश्चंद्र उरांव, बरती उरांव, लाली उरांव, प्रदीप उरांव, आनंद उरांव, संतोष उरांव, मिंटू उरांव, प्रभु उरांव, संजय उरांव, पवन उरांव, लालदेव उरांव, गन्दूर उरांव, संजय उरांव, पवन उरांव, दिले उरांव, अनीता देवी, सुषमा देवी, तेतरी देवी, रजिंता देवी, अंजू देवी, सुनीता देवी, शशि किरण लकड़ा, चांदनी देवी, गुला देवी, धनेश्वर महतो। इनके अलावा सैकड़ों अन्य ग्रामीण भी आंदोलन में शामिल हुए और कंपनी व प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी की।
Leave a comment