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पलामू में बड़ा भूमि घोटाला, 6.33 एकड़ जमीन प्रतिबंध से मुक्त

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पलामू जिले के मेदिनीनगर सदर अंचल अधिकारी द्वारा 6.33 एकड़ भूमि को प्रतिबंधित सूची से मुक्त करने के आदेश के बाद उन पर कथित तौर नियमों की अन्धेकी के आरोप लग रहे है. उनपर कथित आरोप है कि उन्होंने डीसी की अनुमति और जानकारी के बिना ही जमीन को प्रतिबंधित सूची से बाहर करने का आदेश जारी कर दिया, जबकि राज्य सरकार के नियमों के अनुसार इसका अधिकार केवल उपायुक्त को है. जानकारी के अनुसार, पूरे मामले की शुरुआत रजबुदीन मियां द्वारा दिए गए आवेदन से हुई थी. उन्होंने मौजा-रेड़मा स्थित खाता संख्या-505 की 6.33 एकड़ भूमि को प्रतिबंधित सूची से मुक्त करने का आग्रह अंचल कार्यालय से किया था. अपने आवेदन के समर्थन में उन्होंने पुराने सर्वे खतियान की छायाप्रति और जिला अभिलेखागार से प्राप्त महत्वपूर्ण राजस्व अभिलेख प्रस्तुत किए थे.

आवेदन के बाद CO ने कराई मामले की जांच
आवेदन मिलने के बाद अंचल अधिकारी के निर्देश पर राजस्व उपनिरीक्षक और अंचल निरीक्षक द्वारा मामले की जांच की गई. जांच के दौरान पाया गया कि संबंधित खाते से जुड़े पुराने रिकॉर्ड हल्का कार्यालय में उपलब्ध नहीं थे. इसके बाद जिला अभिलेखागार में उपलब्ध वर्ष 2010 के रिकॉर्ड का मिलान किया गया. अभिलेखों के सत्यापन में यह सामने आया कि खाता संख्या-505 के अंतर्गत आने वाले विभिन्न प्लॉटों का कुल रकबा 6.33 एकड़ है तथा खतियानी रैयत के रूप में अलिमोहम्मद कुंजड़ा का नाम दर्ज है. दस्तावेजों की सत्यता की पुष्टि होने के बाद प्रशासनिक स्तर पर यह निष्कर्ष निकाला गया कि भूमि निजी प्रकृति की है और इसे सरकारी अथवा प्रतिबंधित श्रेणी में रखना गलत था. इसके बाद सदर अंचल अधिकारी ने 27 अप्रैल 2026 को आदेश जारी करते हुए उक्त भूमि को तत्काल प्रभाव से प्रतिबंधित सूची से बाहर करने का निर्देश दे दिया. वहीं आदेश 28 अप्रैल को जारी किया गया.
 

नियमों के विरुद्ध CO ने जारी किया आदेश
हालांकि, इस आदेश के बाद अंचल अधिकारी की भूमिका पर कथित तौर पर सवाल उठ रहे हैं. दरअसल, झारखंड सरकार के राजस्व, निबंधन एवं भूमि सुधार विभाग द्वारा 10 अक्टूबर 2019 को जारी अधिसूचना के अनुसार, यदि कोई निजी भूमि गलती से प्रतिबंधित सूची में चली जाती है, तो उसे सूची से हटाने का अधिकार केवल संबंधित जिले के उपायुक्त को है. कोई अन्य अधिकारी सीधे तौर पर ऐसी भूमि को प्रतिबंधित सूची से बाहर नहीं कर सकता.
 

ऐसे मामले में DC की होती है अहम भूमिका
सरकारी प्रक्रिया के अनुसार, प्रभावित व्यक्ति को उचित कारणों के साथ उपायुक्त के समक्ष आवेदन देना होता है. इसके बाद उपायुक्त द्वारा पूरे मामले की जांच कराई जाती है. जांच में दावा सही पाए जाने पर उपायुक्त ही संबंधित प्लॉट को प्रतिबंधित सूची से मुक्त करने का आदेश जारी करते हैं. इसके बाद उपायुक्त राज्य सूचना पदाधिकारी को NGDRS सॉफ्टवेयर की प्रतिबंधित सूची से उस प्लॉट को हटाने का अनुरोध भेजते हैं. NIC द्वारा कार्रवाई करते हुए भूमि को सूची से हटाया जाता है और इसकी सूचना उपायुक्त, निदेशक भू-अर्जन तथा निबंधन महानिरीक्षक को दी जाती है. नियमों के अनुसार सरकारी जमीनों की रजिस्ट्री अवैध मानी जाती है और उनकी सूची सॉफ्टवेयर में लॉक रहती है. यदि किसी निजी भूमि को इस लॉक सूची से बाहर करना हो, तो उसके लिए उपायुक्त ही एकमात्र सक्षम पदाधिकारी माने गए हैं.
 

जब DC है सक्षम पधाधिकारी तो CO ने कैसे जारी किया आदेश?
ऐसे में अब सवाल उठ रहे हैं कि जब नियम स्पष्ट रूप से उपायुक्त को ही सक्षम प्राधिकारी बताते हैं, तब सदर अंचल अधिकारी ने किस आधार पर और किस अधिकार से उक्त 6.33 एकड़ भूमि को प्रतिबंधित सूची से मुक्त करने का आदेश जारी किया. मामले को लेकर प्रशासनिक गलियारों में चर्चा तेज है और अंचल अधिकारी पर कथित तौर पर नियमों की अनदेखी करने के आरोप लग रहे हैं. 

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