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रात में चलता क्रेशर, दिन में उठते सवाल

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शहरग्राम में नियमों की अनदेखी से ग्रामीण परेशान

पाकुड़ ब्यूरो | जितेन्द्र यादव

महेशपुर प्रखंड के शहरग्राम गांव में संचालित “गुरु शिष्य स्टोन वर्क” क्रेशर को लेकर ग्रामीणों में भारी नाराजगी है। ग्रामीणों का आरोप है कि क्रेशर का संचालन नियमों के विपरीत रात के समय किया जाता है, जिससे पूरे इलाके में शोर, धूल और भय का माहौल बना रहता है।

दिन में सन्नाटा, रात में तेज़ आवाज़

ग्रामीणों के अनुसार, दिन के समय क्रेशर परिसर में गतिविधि बेहद सीमित रहती है, जबकि रात होते ही मशीनें तेज़ आवाज़ के साथ चलने लगती हैं। इससे न सिर्फ नींद में खलल पड़ता है, बल्कि जमीन में कंपन तक महसूस किया जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि रात में संचालन इसलिए किया जाता है ताकि जांच और निगरानी से बचा जा सके।

ओवरलोड वाहन बने जान का खतरा

क्रेशर से जुड़े ओवरलोड पत्थर लदे वाहन गांव की संकरी सड़कों से लगातार गुजर रहे हैं। ग्रामीण बताते हैं कि सड़कों की हालत खराब हो चुकी है और किसी भी समय बड़ा हादसा हो सकता है।

बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग सबसे ज्यादा असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

धूल से बिगड़ रही सेहत
क्रेशर से उड़ने वाली महीन धूल अब खेतों और सड़कों तक सीमित नहीं है। यह घरों के अंदर तक पहुंच रही है। ग्रामीणों का कहना है कि धूल के कारण सांस लेने में दिक्कत, आंखों में जलन और त्वचा संबंधी समस्याएं बढ़ गई हैं।

खिड़कियां-दरवाजे बंद रखने के बावजूद धूल घरों में जम जा रही है।

खेती पर सीधा असर

किसानों के मुताबिक खेतों पर लगातार जम रही धूल से फसलों को भारी नुकसान हो रहा है। पैदावार घट रही है, लेकिन इसकी भरपाई करने या जिम्मेदारी लेने वाला कोई नहीं है। किसानों में इसे लेकर गहरी चिंता है।

सरकारी तालाब में मिट्टी डंप करने का आरोप

ग्रामीणों ने गंभीर आरोप लगाया है कि खदान से निकली मिट्टी को सरकारी ढोभा (तालाब) में डाला जा रहा है। यदि यह आरोप सही है, तो इससे गांव की जल व्यवस्था, पशुपालन और खेती पर दीर्घकालीन असर पड़ सकता है।

ग्रामीणों में यह चर्चा है कि क्रेशर को किसी न किसी स्तर पर संरक्षण प्राप्त है।

आंदोलन की चेतावनी

ग्रामीणों ने साफ कहा है कि यदि जल्द कार्रवाई नहीं हुई, तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाने को मजबूर होंगे।

शहरग्राम के लोग पूछ रहे हैं—
क्या नियम सिर्फ कागजों तक सीमित हैं?

क्या रात में चलने वाला कारोबार जांच से ऊपर है?

क्या गांव की सेहत और भविष्य की कोई कीमत नहीं?

अब यह मामला सिर्फ गांव का नहीं, बल्कि प्रशासन की जिम्मेदारी और जवाबदेही से जुड़ा सवाल बन चुका है।

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