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नियमों को रौंदता खनन, पत्थर व्यवसाई द्वारा केनाल जमीन हड़पने और लीज से बाहर पत्थर का अवैध दोहन।

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NGT और खनन विभाग के मानक कागजों तक सीमित, सरकारी राजस्व को भारी नुकसान—जिम्मेदार की भूमिका पर सवाल

पाकुड़ से जितेन्द्र यादव की रिपोर्ट

हिरणपुर अंचल क्षेत्र के वीरग्राम स्थित फाइव स्टार स्टोन माइंस पर नियम-कानून की अनदेखी कर खनन किए जाने के गंभीर आरोप सामने आए हैं। आरोप है कि कंपनी ने खदान के साथ-साथ केनाल की जमीन का भी कथित तौर पर “विकास” कर दिया, जिससे केनाल की पहचान ही मिट गई। खनन विभाग के मानकों और एनजीटी (NGT) के नियमों के अनुसार केनाल से 250 मीटर की दूरी में खनन निषिद्ध है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे उलट बताई जा रही है। स्थानीय सूत्रों का कहना है कि नियमों का पालन सिर्फ कागजों तक सीमित है, जबकि वास्तविक गतिविधियां “टेबल के नीचे” तय होती हैं। यही वजह है कि लीज एरिया के बाहर भी पत्थर का अवैध दोहन धड़ल्ले से किया जा रहा है। पत्थर व्यवसायियों में यह धारणा बन चुकी है कि जिम्मेदार “मैनेज” हो जाते हैं और बाद में सब कुछ दस्तावेजों में रफा-दफा कर दिया जाएगा। इसका सीधा नुकसान सरकार के राजस्व को होता है, जबकि कंपनी और जिम्मेदार सुरक्षित रहते हैं। मामला यहीं तक सीमित नहीं है। आरोप है कि फाइव स्टार स्टोन वर्क्स को हिरणपुर अंचल के मानसिंहपुर और प्रतापपुर में जो लीज दी गई, उसमें अंचल अधिकारी की रिपोर्ट ही गलत थी। लीज क्षेत्र के आसपास गोचर जमीन, खेल मैदान और एक मस्जिद स्थित होने के बावजूद खनन की स्वीकृति मिलना, खुल्लमखुल्ला भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जब नियमों के सामने पैसे भारी पड़ेंगे, तो कानून का औचित्य ही क्या रह जाएगा। ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो अवैध खनन का यह सिलसिला और तेज होगा, जिससे पर्यावरण, सार्वजनिक संपत्ति और सरकारी राजस्व—तीनों को भारी नुकसान होगा। अब देखना यह है कि प्रशासन आरोपों की जांच कर जिम्मेदारों पर कार्रवाई करता है या यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाता है।

प्रशासनिक पक्ष

जब इस पूरे मामले पर अंचल अधिकारी (CO) से उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया, तो उन्होंने इसे खनन विभाग से संबंधित विषय बताते हुए कोई ठोस जवाब देने से परहेज किया। CO ने कहा कि इस संबंध में जिला खनन पदाधिकारी (DMO) ही अधिकृत रूप से जानकारी दे सकते हैं।

वहीं, जब इस विषय में DMO से जानकारी लेने का प्रयास किया गया, तो उन्होंने फोन कॉल रिसीव नहीं किया, जिससे प्रशासनिक उदासीनता पर और भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

अब देखना यह होगा कि प्रशासन इन गंभीर आरोपों की जांच कर दोषियों पर कार्रवाई करता है या यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाता है

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