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एनटीपीसी मजदूर यूनियन एटक 1 अप्रैल को काला दिवस मनाएगी- मनोज कुमार महतो

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Khabar365news

पीवीयूएनएल मैनपॉवर में कार्यरत मजदूरों के परिवारों को ईएसआईसी में नाम जोड़ने को लेकर पीवीयूएन‌एल प्रबंधक को मांग पत्र देगी।

रिपोर्ट – सुमित कुमार पाठक पतरातु

रविवार को यूनियन कार्यालय पीटीपीएस में एनटीपीसी मजदूर यूनियन एटक पीवीयूएनएल शाखा पतरातु की बैठक हुई जिसकी अध्यक्षता भाकपा अंचल सचिव सह एनटीपीसी मजदूर यूनियन एटक शाखा सचिव कामरेड मनोज कुमार महतो की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में निर्णय लिया गया है कि मोदी सरकार द्वारा जो चार लेबर कोड 1 अप्रैल से लागू करना है उसके विरोध में एनटीपीसी मजदूर यूनियन एटक पतरातू 1 अप्रैल को काला दिवस मनाएगी।

वही कामरेड मनोज कुमार महतो ने कहा कि आए दिन मजदूर अपनी समस्याओं को लेकर यूनियन के पास आते हैं पीवीयूएनएल के द्वारा संचालित जितने भी मैनपॉवर हैं उसमें मजदूरों को ईएसआईसी का केवल रजिस्ट्रेशन किया गया है उनके परिवारों को नाम जोड़ने में आनाकानी एजेंसियां कर रही है यूनियन ईएसआईसी की समस्याओं को लेकर पीवीयूएनएल प्रबंधक एवं ईएसआईसी को पत्र लिखकर मांग करेगी की जितने भी मैनपॉवर के मजदूर हैं उन सभी मजदूरों को उनके परिवारों का नाम जोड़ा जाए।

साथ ही भेल के अंतर्गत जितने भी एजेंसी में कार्यरत मजदूर है उनके परिवारों को भी ईएसआईसी में नाम जोड़ा जाए। वहीं दूसरी तरफ मोदी सरकार 44 श्रम कानून को चार लेबर कोड में बदलकर 1 अप्रैल 2026 से पूरे देश में लागू करने जा रही है इसके विरोध में सभी केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के आवाहन पर 1 अप्रैल 2026 को पूरे देश में काला दिवस मनाया जाएगा एनटीपीसी मजदूर यूनियन भी 1 अप्रैल 2026 को लेबर कोड लागू होने पर काला दिवस मनाएगी। आज देश में पूंजीपतियों के इशारे पर मजदूर विरोधी काले कानून बनाए जा रहे हैं मजदूरों के डेढ़ सौ वर्ष पुराना कानून को मोदी सरकार निरस्त करके नया कानून लागू कर रही है जिससे मजदूरों का अत्यधिक शोषण बढ़ जाएगा एवं ट्रेड यूनियन बनाने एवं हड़ताल करने यूनियन को निरस्त करना आसान हो जाएगा।


12 फरवरी की ऐतिहासिक आम हड़ताल के बाद भी केंद्र सरकार इन श्रम संहिताओं को वापस लेने या इस मुद्दे पर केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के साथ कोई सार्थक बैठक करने से बच रही है।
इसके अलावा, इन संहिताओं के मसौदा तैयार करने के चरण से ही ट्रेड यूनियनों जैसे हितधारकों से कोई परामर्श नहीं किया गया। इतने गंभीर मुद्दे पर, जो देश के कार्यबल के जीवन से जुड़ा है, लंबे समय से भारतीय श्रम सम्मेलन भी नहीं बुलाया गया। यह अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों का उल्लंघन है।
ये श्रम संहिताएँ देश के श्रमिकों—जो संपत्ति के वास्तविक सृजनकर्ता हैं—को फिर से ब्रिटिश औपनिवेशिक काल जैसी शोषणकारी परिस्थितियों में धकेलने का प्रयास हैं। श्रमिक वर्ग ने औपनिवेशिक काल में अत्यधिक शोषण के खिलाफ और स्वतंत्र भारत में भी 8 घंटे के कार्यदिवस, कार्यस्थल सुरक्षा, यूनियन बनाने और संगठित होने के अधिकार, सामूहिक सौदेबाजी, आंदोलन करने और हड़ताल के अधिकार के लिए संघर्ष किया है। उन्होंने सम्मानजनक वेतन, सामाजिक सुरक्षा, ठेका श्रमिकों के नियमितीकरण, स्थायी कार्यों में ठेका प्रथा समाप्त करने, समान काम के लिए समान वेतन, बोनस, ग्रेच्युटी और पेंशन के अधिकार के लिए भी लड़ाई लड़ी है।
हमने 1926 के ट्रेड यूनियन अधिनियम के माध्यम से यूनियन बनाने के अधिकार को वैधानिक मान्यता दिलाई। ब्रिटिश काल में हमारे पूर्वजों के संघर्ष से कई श्रम कानून बने, और स्वतंत्र भारत में संसद द्वारा कुल 44 केंद्रीय श्रम कानून तथा राज्यों द्वारा लगभग 150 कानून बनाए गए, क्योंकि श्रम भारतीय संविधान की समवर्ती सूची में शामिल है।
वर्तमान केंद्र सरकार इन श्रम संहिताओं के माध्यम से इन उपलब्धियों को समाप्त करने की दिशा में कदम बढ़ा रही है। इन संहिताओं में ऐसे कठोर और दमनकारी प्रावधान हैं, जिनसे यूनियन बनाना कठिन, पंजीकरण मुश्किल और निरस्तीकरण आसान हो जाएगा। नियोक्ताओं के उल्लंघनों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया जा रहा है, जबकि ट्रेड यूनियन गतिविधियों को दंडनीय बनाया जा रहा है। कार्य समय की सीमा को खुला
छोड़ दिया गया है, जिससे उसे मनमाने ढंग से बढ़ाया जा सके। हड़ताल का अधिकार लगभग समाप्त कर दिया गया है।
फिक्स्ड टर्म रोजगार को सामान्य बनाया जा रहा है, मौजूदा सामाजिक सुरक्षा कानूनों को कमजोर किया जा रहा है और सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा के झूठे दावे के बावजूद अधिक श्रमिकों को इसके दायरे से बाहर रखा जा रहा है। सुरक्षा मानकों से समझौता किया जा रहा है और 17 क्षेत्रीय श्रम कानूनों को समाप्त कर बड़ी संख्या में श्रमिकों को व्यावसायिक सुरक्षा और स्वास्थ्य के अधिकार से वंचित किया जा रहा है।
न्यूनतम वेतन कानूनों को कमजोर कर गरीबी रेखा से नीचे ‘राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन’ लागू करने की कोशिश की जा रही है। ये संहिताएँ संगठित क्षेत्र को असंगठित बनाने और असंगठित श्रमिकों को अधिकारों से वंचित करने की दिशा में हैं। मौके पर मनोज कुमार महतो मनोज चौहान नरेश बेदिया, प्रदीप सिंह, विक्की महतो, सतनारायण सिंह, विजेंद्र कुमार, विनय गुप्ता, नरेश सिंह, बिजेंदर राम, शिवा मिंज, गुलटन उरांव ,मिशु कुमार अनिल कुमार आदि मौजूद थे।

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