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शिलान्यास तक ही सिमट कर रह गया मंडल डैम परियोजना, आधारशिला रखे गुजर गए 4 साल

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Khabar365news

by: k.madhwan

अभी तक इस परियोजना के निर्माण कार्य पर करीबन 769.09 करोड़ रुपए की खर्च की जा चुकी है धनराशि

लातेहार: 5 जनवरी, 2019 को चियांकी हवाई अड्डा से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा मंडल डैम परियोजना का ऑनलाइन शिलान्यास किया गया था। जिसकी कुल लागत 2391 करोड़ रुपये थी। जिसमें केंद्र सरकार 1378.61 करोड़, बिहार सरकार 212.43 करोड़ और सबसे कम झारखंड सरकार को 31.23 करोड़ रुपये का योगदान करना था। लेकिन तब से लेकर अब तक मंडल डैम के निर्माण कार्य को लेकर परियोजना स्थल पर एक फीसदी भी काम नहीं हो सका है। निर्माणाधीन क्षेत्र अभी तक खंडहरों में तब्दील है। ऐसे में कहीं ना कहीं ये सरकार और सिस्टम दोनों पर सवालिया निशान खड़ा करता नजर आ रहा है।

चतरा सांसद सुनील कुमार सिंह की पहल से जगी थी आस:

चतरा सांसद सुनील कुमार सिंह ने 2014 में लोकसभा चुनाव जीतकर संसद सत्र के पहले दिन यानी 7 जुलाई, 2014 को नियम 377 के तहत मंडल डैम के निर्माण का मुद्दा उठाया था। इसके बाद वे लगातार संसद में इस मामले को उठाते रहें। इसी की नतीजा था कि तत्कालीन केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडेकर ने मंडल डैम का दौरा किया। कई बार केंद्रीय टीम भी पहुंची। सांसद के विभिन्न स्तर पर किए गए प्रयास से लोगों में आस जगी थी लेकिन वह भी धीरे-धीरे धराशायी हो गई।

वाप्‍कोस लिमिटेड कंपनी को मिला था निर्माण कार्य का जिम्मा:

इस परियोजना को केंद्र सरकार ने अधिग्रहित कर लिया था। जिसका निर्माण केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय द्वारा कराए जाने की बात कही गई थी। इसके लिए वाप्‍कोस को नोडल एजेंसी बनाया गया था।

सात महीने पहले मंडल डैम के निर्माण कार्य को लेकर दिल्ली में हुई थी समीक्षा बैठक:

दिल्ली के श्रम शक्ति भवन स्थित मंत्रालय में सात महीने पहले केन्द्रीय जल शक्ति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत की अध्यक्षता में उत्तरी कोयल जलाशय परियोजना (मंडल डैम) के निर्माण कार्य की समीक्षा बैठक हुई थी, जिसमें चतरा सांसद सुनील कुमार सिंह ने दावा किया था कि उत्तरी कोयल जलाशय परियोजना (मंडल डैम) का 95 प्रतिशत कार्य पूरा हो चुका है। बाकी बचे निर्माण कार्य को 2024 से पहले पूरा कर लिया जाएगा।

इन वजहों से हुई मंडल डैम निर्माण में देरी:

  1. सर्वप्रथम तो वर्ष 1993 में इसे बिहार सरकार के वन विभाग द्वारा रुकवा दिया गया।
  2. अगस्त 1997 की रात में कुटकुट डूब क्षेत्र के 10 गांवों में पानी घुस गया था। जिससे 20 व्यक्ति मर गये थे। उनमें दो पुरुष, पांच महिलाएं एवं 13 बच्चे शामिल थे। इस बाढ़ से 462 घर ढह गये थे। 438 क्विंटल भंडारित अनाज और 182 क्विंटल खेतों में डाले गये अनाज बर्बाद हो गये थे। 900 से ज्यादा मवेशी पानी में डूबकर मर गये थे एवं लाखों रुपये का घरेलू सामान नष्ट हो गया था। नक्सली संगठन इस घटना को पार्टी यूनिटी इंजीनियर की तकनीकी गलती का परिणाम मानते थे। इसलिए उन्होंने 16 अगस्त 1997 को अधीक्षण अभियंता बैजनाथ मिश्रा की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी और उन्होंने बांध के पाया को भी बम ब्लास्ट कर उड़ाने की कोशिश की थी।
  3. मंडल डैम में मे अप्रैल 1999 को रख-रखाव के अभाव में परियोजना स्थल के आसपास के झाडिय़ों में आग लग जाने के कारण छह जीप, दो ट्रक, सात ट्रैक्टर, एक रोड रोलर व 70 नये टायर जलकर नष्ट हो गए। वीरान पड़े उत्तर कोयल जलविद्युत परियोजना से लोहा की चोरी करने वाला गिरोह सक्रिय रहा। उक्त स्थान से ट्रैक्टर समेत अन्य वाहनों में लादकर लोहा माफिया इसे बाजारों में बेचा गया। सुरक्षा का अभाव होने के कारण कोई भी कर्मचारी इसका विरोध करने की हिमाकत नहीं करता। नक्सलियों ने लोहा चोर गिरोह के कुछ सदस्यों की गोली मारकर हत्या भी की थी तथा शव को यत्र-तत्र फेंक दिया था। नक्सलियों ने परियोजना स्थल से चुराये गये लोहे से लदी तीन ट्रैक्टरों को फूंक डाला था तथा दर्जनों लोहा चोरों का अगवा कर ले गये थे, जहां उनकी पिटाई भी की गई थी। इन सारे वजहों से मंडल डैम का निर्माण कार्य बाधित रहा।
  4. 5 जनवरी, 2019 को चियांकी हवाई अड्डा से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंडल डैम परियोजना का ऑनलाइन शिलान्यास किया था। लेकिन आज 4 वर्षों बाद भी डैम निर्माण का कार्य पूरा नहीं हो सका।

1970 में इस परियोजना की अनुमानित राशि थी 30 करोड़ रुपये:

बता दें कि वर्ष 1970 में इस परियोजना की अनुमानित राशि 30 करोड़ रुपये थी, जिसमें से 44000 एकड़ कमान क्षेत्र में सिंचाई, पेयजल, औद्योगिक संस्थानों के लिए जल आपूर्ति एवं 24 मेगावाट जल विद्युत उत्पादन करने की योजना थी। इसके बाद वर्ष 1985 में पुनरीक्षित कर डैम निर्माण की प्राक्कलित राशि को 439 करोड़ रुपये कर दिया गया था, जो बाद में बढकर 581 करोड़ रुपये हो गया था। लेकिन योजना आयोग द्वारा योजना की स्वीकृति सन् 1989 के सितंबर में मिली थी।

क्या है मंडल डैम परियोजना:

यह परियोजना सोन नदी की सहायक उत्तरी कोयल नदी (यह रांची पठार से निकलती है) पर स्थित है जो झारखंड के उत्तर-पश्चिम में स्थित हैदरनगर में सोन नदी से मिलती है तथा अंत में गंगा नदी में समाहित हो जाती है। बता दें कि उत्तरी कोयल नदी अपनी सहायक नदियों के साथ बेतला राष्ट्रीय उद्यान के पश्चिमी भाग से होकर बहती है। इसकी सहायक नदियाँ औरंगा (Auranga) एवं अमानत (Amanat) हैं। यह झारखंड राज्‍य में पलामू और गढ़वा ज़िलों के अत्‍यंत पिछड़े जनजातीय इलाके में स्थित है।

मंडल डैम

मंडल डैम की मुख्य बातें:

इस परियोजना का निर्माण कार्य सर्वप्रथम वर्ष 1972 में शुरू हुआ था, परंतु वर्ष 1993 में इसे बिहार सरकार के वन विभाग द्वारा रुकवा दिया गया।इस परियोजना के अंतर्गत 67.86 मीटर ऊँचे और 343.33 मीटर लंबे कंक्रीट के बांध का निर्माण किया जाना सुनिश्चित किया गया था।इस बांध को उस समय मंडल बांध का नाम दिया गया। इस बांध की क्षमता 1160 मिलियन क्‍यूबिक मीटर निर्धारित की गई थी। इसके अलावा इस परियोजना के तहत नदी के बहाव की निचली दिशा में मोहनगंज में 819.6 मीटर लंबे बैराज के निर्माण का भी प्रावधान किया गया था। साथ ही यह सुनिश्चित किया गया कि बैराज के दाएँ एवं बाएँ तट से सिंचाई के लिये दो नहरें वितरण प्रणालियों समेत बनाई जाएंगी। उल्लेखनीय है कि इस परियोजना के पूरा हो जाने पर झारखंड के पलामू और गढ़वा ज़िलों के साथ-साथ बिहार के औरंगाबाद और गया ज़िलों के सबसे पिछड़े एवं सूखे की स्थिति वाले इलाकों में 111,521 हेक्‍टेयर ज़मीन की सिंचाई की व्‍यवस्‍था होने की संभावना है।

डैम बनने से गांवों में रहने वाले 749 परिवारों के 6013 लोग होंगे विस्थापित:

इस परियोजना में गढ़वा जिला के भंडरिया प्रखंड स्थित शहीद नीलांबर-पीतांबर की जन्मस्थली चेमो सान्या समेत 16 गांव तथा लातेहार जिला के बरवाडीह प्रखंड के तीन गांव डूब क्षेत्र में शामिल हैं। इन 19 गांवों में 749 परिवारों के 6013 लोग विस्थापित होंगे। इसमें 5002 आदिवासी, 303 दलित तथा 681 अन्य जातियों के लोग शामिल हैं। डैम की वजह से 38,508.21 एकड़ भूमि जलमग्न होगी। जिसमें 3044.38 एकड़ रैयती जमीन, 12756.51 एकड़ गैर मजरुआ जमीन तथा 2266.72 एकड़ वनभूमि शामिल हैं।

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