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मर्यादा भूले सांसद सीपी चौधरी, अफसरों को दी सार्वजनिक धमकी

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Khabar365news

रामगढ़ के कुल्ही चौक पर सोमवार को जो कुछ हुआ, वह सिर्फ एक प्रशासनिक विवाद नहीं था, बल्कि एक सांसद के आचरण पर गंभीर सवाल खड़े करने वाली घटना थी। सड़क निर्माण और घेराबंदी की शिकायत पर पहुंचे आजसू सांसद चंद्र प्रकाश चौधरी का व्यवहार उस मर्यादा के बिल्कुल उल्टा दिखा, जिसकी अपेक्षा एक जनप्रतिनिधि से की जाती है। सवाल पूछना, जवाब मांगना और गड़बड़ियों पर सख्ती दिखाना सांसद का अधिकार है लेकिन भाषा और लहजा सीमित दायरे में होना चाहिए। चंद्र प्रकाश चौधरी अपने लहजे पर पूरी तरह फिसलते नजर आए। एनएचएआई के अधिकारियों से बातचीत के दौरान सांसद ने जिस तरह के शब्दों का इस्तेमाल किया, वह न सिर्फ अभद्र था बल्कि सार्वजनिक मंच पर धमकी थी। ये किसका रोड है, पता भी है? अक्कल है? एक झांप मारेंगे तो याद आ जाएगा ये शब्द किसी सड़कछाप गुंडे या दबंग के हो सकते हैं, किसी सांसद के नहीं। सवाल यह नहीं है कि एनएचएआई के अधिकारी सही थे या गलत, सवाल यह है कि क्या एक सांसद को यह अधिकार है कि वह तर्क की जगह गाली-गलौज और हाथ उठाने की धमकी का सहारा ले। बताया गया कि भारतमाला परियोजना के तहत सड़क निर्माण कार्य चल रहा था और घेराबंदी को लेकर स्थानीय लोगों ने शिकायत की थी। सांसद मौके पर पहुंचे, यह स्वागतयोग्य कदम था।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बिना पीडब्ल्यूडी से सड़क ट्रांसफर हुए काम किया जा रहा है, एप्रोच रोड को ब्लॉक किया गया है, पहाड़ काटकर पत्थरों का उपयोग हो रहा है और भुगतान तक उठा लिया गया है। अगर ये आरोप सही हैं, तो यह बेहद गंभीर मामला है और इस पर जांच होनी चाहिए। लेकिन क्या जांच की शुरुआत आप लोग गुंडा बन रहे हैं क्या जैसे शब्दों से होती है? एक सांसद का रुतबा उसकी आवाज़ में नहीं, उसके तर्क में होता है। अधिकारियों से जवाब न मिलने पर और भी सख्ती से सवाल पूछे जा सकते थे, लिखित जवाब मांगा जा सकता था, काम रुकवाया जा सकता था। उच्च स्तर पर शिकायत की जा सकती थी। लेकिन सार्वजनिक रूप से थप्पड़ मारने की बात कहना न सिर्फ शर्मनाक है, बल्कि यह संवैधानिक पद की गरिमा को ठेस पहुंचाने जैसा भी है जिस पर बैठकर वे ये बोल रहे थे। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि अधिकारी प्रशासनिक तंत्र का हिस्सा होते हैं। वे जवाबदेह हैं, लेकिन वे किसी नेता के निजी कर्मचारी नहीं हैं।

अगर सांसद को लगता है कि अधिकारी मनमानी कर रहे हैं, तो कानून उनके खिलाफ कार्रवाई का रास्ता देता है। मगर धमकी और अपमान का रास्ता लोकतंत्र को कमजोर करता है। आज अगर एक सांसद किसी अधिकारी को सबके सामने यह कहे कि एक झांप मारेंगे तो कल वही भाषा सड़क पर आम आदमी के बीच कैसे रोकी जाएगी? चंद्र प्रकाश चौधरी को अक्सर शांत और संयमित नेता के रूप में देखा जाता रहा है, लेकिन कुल्ही चौक पर उनका यह रूप किसी थप्पड़बाज नेता की छवि गढ़ता है। यह छवि न रामगढ़ के लिए अच्छी है, न झारखंड की राजनीति के लिए और न ही संसद की गरिमा के लिए। जनप्रतिनिधि का गुस्सा व्यवस्था की खामियों पर होना चाहिए, न कि व्यक्ति विशेष पर उतारू धमकियों में बदल जाना चाहिए। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यह सब कैमरों और लोगों के सामने हुआ। यानी यह कोई निजी बातचीत नहीं थी, बल्कि सार्वजनिक था। ऐसे में संदेश जाता है कि ताकत और पद के बल पर किसी को भी अपमानित किया जा सकता है।

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