जामताड़ा, जो एक समय देश में साइबर अपराध के गढ़ के रूप में जाना जाता था, आज पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली और संसाधनों पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। यह सुनकर हैरानी होती है कि किसी थाने का अस्तित्व तो हो, लेकिन वहां कैदियों को रखने के लिए ‘हाजत’ यानी लॉक-अप ही न हो। ऐसी ही अजीब स्थिति जामताड़ा के साइबर थाने की है। जामताड़ा में साइबर अपराधियों के बढ़ते नेटवर्क और करोड़ों रुपये की ठगी के मामलों को देखते हुए वर्ष 2016 में साइबर थाने की स्थापना की गई थी। इसका उद्देश्य तकनीक की मदद से अपराधियों पर नकेल कसना था। लेकिन विडंबना यह है कि स्थापना के आठ साल बाद भी इस थाने के पास न तो अपना स्थायी भवन है और न ही लॉक-अप यानी हाजत की सुविधा। फिलहाल यह थाना आईटीडीए (ITDA) विभाग के एक भवन में संचालित हो रहा है।
हैरानी की बात यह है कि जब साइबर पुलिस किसी बड़े अपराधी को गिरफ्तार करती है, तो उसे रखने के लिए थाने में उचित व्यवस्था नहीं होती। ऐसे में मजबूरन आरोपियों को एक छोटे से सीढ़ी वाले कमरे में रखा जाता है या फिर उन्हें पास के टाउन थाना या महिला थाना की हाजत में शिफ्ट करना पड़ता है। इससे न केवल पुलिस की कार्यक्षमता प्रभावित होती है, बल्कि आरोपियों की सुरक्षा और उनसे पूछताछ की गोपनीयता पर भी सवाल उठते हैं। इस मामले पर कानून के जानकारों का रुख काफी सख्त है। जामताड़ा व्यवहार न्यायालय के वरिष्ठ आपराधिक अधिवक्ता उमेश कुमार सिंह के अनुसार, कानून के तहत प्रत्येक थाने में हाजत का होना अनिवार्य है। बिना हाजत के आरोपियों को रखना मानवाधिकारों और कानूनी प्रक्रियाओं का उल्लंघन माना जा सकता है।
वहीं, साइबर थाना प्रभारी राजेश मंडल ने स्वीकार किया कि वर्तमान भवन जिला प्रशासन द्वारा उपलब्ध कराया गया है और इसमें हाजत की व्यवस्था नहीं है। उन्होंने बताया कि सुरक्षा कारणों से गिरफ्तार आरोपियों को टाउन थाना में रखा जाता है। हालांकि राहत की बात यह है कि नए साइबर थाना भवन का निर्माण लगभग पूरा हो चुका है और उसमें सभी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। जामताड़ा साइबर पुलिस भले ही करोड़ों की ठगी करने वाले अपराधियों को पकड़ने में सफल हो रही है, लेकिन एक साधारण हाजत की कमी व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर करती है।
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