पाकुड़ से जितेन्द्र यादव की रिपोर्ट
जहां एक ओर बेलपहरी में अजहर इस्लाम द्वारा संचालित अवैध खदान का मामला अभी पूरी तरह ठंडा भी नहीं पड़ा है, जांच और कार्रवाई की फाइलें धूल फांक रही हैं, वहीं दूसरी ओर हिरणपुर थाना क्षेत्र के बेलडीहा में ब्लैक डायमंड खदान की दुख भरी कहानी अब सामने आकर सिस्टम की नींद उड़ा रही है।
मानो पत्थर माफिया को न कानून का डर है, न प्रशासन की सख्ती का।
एक मामला दबता नहीं कि दूसरा सिर उठा लेता है।
बेलडीहा गांव की धरती आज भी उसी दर्द से कराह रही है, जिससे बेलपहरी गुज़रा था। यहां भी लीज एरिया से बाहर लगभग एक एकड़ जमीन में अवैध खनन कर लिया गया। खेत उजाड़ दिए गए, जमीन को छलनी कर दिया गया और ग्रामीणों को डर के साए में जीने पर मजबूर कर दिया गया।
ग्रामीणों का कहना है कि बेलपहरी की तरह ही यहां भी कहानी वही है—
भारी मशीनें, रात की ब्लास्टिंग, उड़ती धूल,
और सवाल पूछने पर धमकी और खामोशी।
एक ग्रामीण ने दर्द भरे लहजे में कहा—
“जब बेलपहरी में इतना बड़ा मामला सामने आने के बाद भी कुछ नहीं हुआ, तो हमें किस बात की उम्मीद करें? यहां भी वही होगा—खदान चलेगी, हम सहते रहेंगे।”
सबसे भयावह पहलू यह है कि दो अलग-अलग इलाकों में, अलग-अलग नामों से चल रहा अवैध खनन एक ही सच्चाई बयान करता है—
पत्थर माफिया का नेटवर्क मजबूत है,
और उसे रोकने वाला तंत्र या तो कमजोर है, या फिर मिला हुआ।
बेलपहरी में अजहर इस्लाम के अवैध खनन पर उठे सवाल अभी जवाब ढूंढ ही रहे हैं कि बेलडीहा में ब्लैक डायमंड खदान ने यह साबित कर दिया कि अवैध खनन कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक चलती हुई व्यवस्था बन चुका है।
अब सवाल सिर्फ़ यह नहीं कि
कौन अवैध खनन कर रहा है,
सवाल यह है कि—
क्या प्रशासन एक मामले पर कार्रवाई कर दूसरे को खुली छूट देता रहेगा?
या फिर बेलपहरी और बेलडीहा—दोनों की दुख भरी कहानियों को जोड़कर कोई ठोस कदम उठाएगा?
अगर नहीं, तो आने वाले दिनों में यह सूची और लंबी होगी—
और हर नया नाम,
हर नई खदान,
किसी न किसी गांव की कहानी को
और ज़्यादा दर्दनाक बना देगा।
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